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Urdu Poetry: साँप को सर पर रखो या पाँव रखो साँप पर

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            साँप को सर पर रखो या पाँव रखो साँप पर, 
        
                                                    
                            
दंश का खतरा रहेगा सिर्फ अपने आप पर।

कुछ समय मन की उठी बेचैनियों को दीजिए, 
भाप पानी से उठेगी एक निश्चित ताप पर।

पैंट पीछे से फटी तो शर्ट बाहर कर लिया, 
मुफलिसी ढँकने में बेटा भी गया है बाप पर।

योजनों की दूरियाँ तो भूमिका में कट गई, 
रुक गई बाकी कहानी उँगलियों की नाप पर।

पत्थरों को पूजने में फूल सब तोड़े गए, 
जिंदगी सारी कटी है वक़्त के अभिशाप पर।

हाय हू हा हाय हू हा कर रहे हैं आज वो, 
लोग जो कल हँस रहे थे गैर के संताप पर।

पुण्य की कुछ पंक्तियों को स्वर्ण में ढाला गया, 
और चस्पा कर दिया सारे जहाँ के पाप पर।

साभार: दिवाकर पाण्डेय 'चित्रगुप्त' की फेसबुक वाल से 

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5 महीने पहले
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