विज्ञापन

असलम कोलसरी: सीने में सुलगते हुए लम्हात का जंगल

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


सीने में सुलगते हुए लम्हात का जंगल
किस तरह कटे तारों भरी रात का जंगल

हाँ दस्त-शनासी पे बड़ा नाज़ था उस को
देखा न गया उस से मिरे हात का जंगल

उम्मीद का इक पेड़ उगाए नहीं उगता
ख़ुद-रौ है मगर ज़ेहन में शुबहात का जंगल

दे ताक़त-ए-परवाज़ कि ऊपर से गुज़र जाऊँ
क्यूँ राह में हाइल है मिरी ज़ात का जंगल

ख़्वाबीदा हैं इस में कई अय्यार दरिंदे
बेहतर है कि जल जाए ये जज़्बात का जंगल

कुछ और मसाइल मिरी जानिब हुए माइल
कुछ और हरा हो गया हालात का जंगल

तस्वीर-ए-ग़ज़ल में से झलकता हुआ 'असलम'
ये शहर-ए-सुख़न है कि ख़ुराफ़ात का जंगल 

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

7 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Nathuram Kaswan

8702 कविताएं

View Profile

Manoj Kumar

428 कविताएं

View Profile