विज्ञापन

आज का शब्द: विहान और गोपाल सिंह नेपाली की कविता- यह दीया बुझे नहीं

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            हिंदी हैं हम शब्द-श्रृंखला में आज का शब्द है विहान जिसका अर्थ है प्रात:काल ; भोर या सवेरा। कवि गोपाल सिंह नेपाली ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। 
        
                                                    
                            

घोर अंधकार हो,
चल रही बयार हो,
आज द्वार–द्वार पर यह दीया बुझे नहीं
यह निशीथ का दीया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ,
शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ,
यह स्वतंत्रता–दीया,
रूक रही न नाव हो
जोर का बहाव हो,
आज गंग–धार पर यह दीया बुझे नहीं,
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।

यह अतीत कल्पना,
यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना,
यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो,
युद्ध¸ संधि¸ क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दीया बुझे नहीं,
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है।

तीन–चार फूल है,
आस–पास धूल है,
बांस है-बबूल है,
घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर दे,
फूंक दे¸ चकोर दे,
कब्र पर मज़ार पर, यह दीया बुझे नहीं,
यह किसी शहीद का पुण्य-प्राण दान है।

झूम-झूम बदलियां
चूम-चूम बिजलियां
आंधिया उठा रहीं
हलचलें मचा रहीं
लड़ रहा स्वदेश हो,
यातना विशेष हो,
क्षुद्र जीत–हार पर, यह दीया बुझे नहीं,
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all