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आज का शब्द: ताप और जयशंकर प्रसाद की कविता- ग्रीष्म का मध्यान्ह

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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                                                  'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- ताप, जिसका अर्थ है- उष्णता, गरमी, ज्वर, बुखार, आँच, लपट। प्रस्तुत है जयशंकर प्रसाद की कविता- ग्रीष्म का मध्यान्ह 

विमल व्योम में देव-दिवाकर अग्नि-चक्र से फिरते हैं
किरण नही, ये पावक के कण जगती-तल पर गिरते हैं

छाया का आश्रय पाने को जीव-मंडली गिरती है
चण्ड दिवाकर देख सती-छाया भी छिपती फिरती है

प्रिय वसंत के विरह ताप से घरा तप्त हो जाती है
तृष्णा हो कर तृषित प्यास-ही-प्यास पुकार मचाती है

स्वेद धूलि-कण धूप-लपट के साथ लिपटकर मिलते हैं
जिनके तार व्योम से बँधकर ज्वाला-ताप उगिलते हैं

पथिक देख आलोक वही फिर कुछ भी देख न सकता है
होकर चकित नहीं आगे तब एक पैर चल सकता है
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निर्जन कानन में तरूवर जो खड़े प्रेत-से रहते है
डाल हिलाकर हाथों से वे जीव पकड़ना चाहते हैं

देखो, वृक्ष शाल्मली का यह महा-भयावह कैसा है
आतप-भीत विहंगम-कुल का क्रन्दन इस पर कैसा है

लू के झोंके लगने से जब डाल-सहित यह हिलता है
कुम्भकर्ण-सा कोटर-मुख से अगणित जीव उगिलता है

हरे-हरे पत्ते वृक्षों के तापित को मुरझाते हैं
देखा देखी सूख-सूखकर पृथ्वी पर गिर जाते हैं

धूल उड़ाता प्रबल प्रभंजन उनको साथ उड़ाता है
अपने खड़-खड़ शब्दों को भी उनके साथ बढ़ाता है
 
3 वर्ष पहले
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