'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- श्लेष, जिसका अर्थ है- संयोग, मिलना, जुड़ना, एक शब्द के दो या अधिक अर्थ होने की अवस्था या भाव। प्रस्तुत है गोपालदास नीरज की कविता- गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारों
गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारों,
कि भीगें हम भी ज़रा संग-संग फिर यारों।
यह रिमझिमाती निशा और ये थिरकता सावन,
है याद आने लगा इक प्रसंग फिर यारों।
किसे पता है कि कब तक रहेगा ये मौसम,
रख है बाँध के क्यूँ मन-कुरंग फिर यारों।
घुमड़-घुमड़ के जो बादल घिरा अटारी पर,
विहंग बन के उड़ी इक उमंग फिर यारों।
कहीं पे कजली कहीं तान उठी बिरहा की,
हृदय में झाँक गया इक अनंग फिर यारों।
पिया की बाँह में सिमटी है इस तरह गोरी,
सभंग श्लेष हुआ है अभंग फिर यारों।
जो रंग गीत का बलबीर जी के साथ गया
न हमने देखा कहीं वैसा रंग फिर यारों।
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