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आज का शब्द: समिध और श्री श्री की कविता- मैंने भी धरणी की वाणी में

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- समिध, जिसका अर्थ है- अग्नि। प्रस्तुत है श्री श्री की कविता- मैंने भी धरणी की वाणी में
        
                                                    
                            

मैंने भी जगती की ज्वाला में
समिध एक चढ़ा दिया!
मैंने भी वसुधा की वर्षा में
आँसू इक बढ़ा दिया!
मैंने भी धरणी की वाणी में
अपना रव मिला दिया!
मैं गर्मी की लू में उल्लू बन
क्या न जीर्ण हो गया!
ज़ोरदार बारिश में भीगा बन
क्या न शीर्ण हो गया!
सर्दी के कंपन में भूखा बन
क्या न मूक सो गया।
यदि मैं ही बच जाऊँ
गर्मी की ज्वालाएँ
बरसाती धाराएँ
बर्फ़ीली बौछारें
ज़मीन पर जल भुन कर
नष्ट भ्रट होंगी रे!
उजियारे वे सारे नभ-तारे
रक्त वमन करते फट जाएँगे!
वासर सब निशीय सब
विशीर्ण बन महान् रण
जग भर में छा देंगे!
इक मैं ही वसुधा में फैला बन
अपनी उस कुहू-कुहू का रव ही
धरती भर-भर दूँगा!
हाँ मैं ही जग वीणा तंत्री बन
स्वर लहरी कर दूँगा!
जगत् कमल के कोमल बन कर दल
विकसित बढ़ जाऊँगा!
मैं ही रे भुवन भवन के तन बन
फहराता छमछम उड़ जाऊँगा।

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