विज्ञापन

आज का शब्द: प्रशांत और जयशंकर प्रसाद की कविता- अपलक जगती हो एक रात !

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- प्रशांत, जिसका अर्थ है- चंचलतारहित, स्थिर, शांत। प्रस्तुत है जयशंकर प्रसाद की कविता- अपलक जगती हो एक रात !
        
                                                    
                            

अपलक जगती हो एक रात!
      सब सोये हों इस भूतल में,
      अपनी निरीहता संबल में,
             चलती हों कोई भी न बात!
      पथ सोये हों हरयाली में,
      हों सुमन सो रहे डाली में,
             हों अलस उनींदी नखत पाँत!
      नीरव प्रशांत का मौन बना ,
      चुपके किसलय से बिछल छना;
             थकता हों पंथी मलय- वात.
      वक्षस्थल में जो छुपे हुए-
      सोते हों हृदय अभाव लिए-
             उनके स्वप्नों का हों न प्रात। 

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

LS Kuntal

1 कविता

View Profile