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आज का शब्द: कृति और मैथिलीशरण गुप्त की कविता- मेरा देश

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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                                                  'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- कृति, जिसका अर्थ है- किया हुआ काम, कार्य,  चित्र, ग्रन्थ, वास्तु आदि के रूप में बनाई हुई वस्तु। प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त की कविता- मेरा देश 

बलिहारी तेरा वरवेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

बाहर मुकुट विभूषित भाल, 
भीतर जटा-जूट का जाल। 
ऊपर नभ, नीचे पाताल, 
और बीच में तू प्रणपाल। 
बंधन में भी मुक्ति निवेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

कभी मुरज-मय वीणावाद, 
कभी स्वरों से साम-निनाद। 
कभी गगनचुंबी प्रासाद, 
कभी कुटी में ही आह्लाद। 
नहीं कहीं भी भय का लेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

है तेरी कृति में विक्रांति, 
भरी प्रकृति में निश्चल शांति। 
फटक नहीं सकती है भ्रांति, 
आँखों में है अक्षय क्रांति, 
आत्मा में है अज अखिलेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 
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सरस्वती का तुझमें वास, 
लक्ष्मी का भी विपुल-विलास। 
प्रिया प्रकृति का पूर्ण विकास, 
फिर भी है तू आप उदास। 
हे गिरीश, हे अंबरकेश! 
मेरे भारत! मेरे देश! 

मस्तक में रखता है ज्ञान, 
भक्ति-पूर्ण मानस में ध्यान। 
करके तू प्रभु-कर्म-विधान, 
है सत् चित् आनंद निधान। 
मेटे तूने तीनों क्लेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

इधर विविध लीला विस्तार, 
उधर गुणों का भी परिहार। 
जिधर देखिए पूर्णाकार, 
किधर कहें हम तेरा द्वार? 
हृदय कहीं से करे प्रवेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

तन से सब भोगों का भोग, 
मन से महा अलौकिक योग। 
पहले संग्रह का संयोग, 
स्वयं त्याग का फिर उद्योग। 
अद्भुत है तेरा उद्देश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

बनकर तू चिर साधन धाम, 
हुआ स्वयं ही आत्माराम, 
लिया नहीं तब तक विश्राम— 
जब तक पूरा किया न काम। 
दिए तुझी ने सब उपदेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

2 वर्ष पहले
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