विज्ञापन

आज का शब्द: अपराजेय और बसंत त्रिपाठी की कविता- रात के ही किसी अचिह्नित क्षण में

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अपराजेय, जिसका अर्थ है- जो पराजित न किया जा सके। प्रस्तुत है बसंत त्रिपाठी की कविता- रात के ही किसी अचिह्नित क्षण में 

रात के ही किसी अचिह्नित क्षण में 
नींद के मंच पर 
जब सपने का महावृत्तांत 
एक चमकदार अलौकिक नृत्य की तरह जारी था 
शायद तभी बरसना शुरू हुए होंगे बादल 

आषाढ़ ने इस बार 
रात के अँधेरे में आना तय कर रखा था 

मुझे लगभग क्षण का भी अंदाज़ नहीं 
लेकिन यह ज़रूर हुआ था 
कि सपनों में बिजली कड़कड़ाई थी 
पानी के बरसने की आवाज़ 
रूप बदलकर सपने में दाख़िल हुई थी 

मैंने बारिश की अगुवाई नहीं की 
लेकिन सपनों ने उसके वैभव के गीत गाए 
विज्ञापन

वह टपाटप तालमय गीत 
कुत्तों का कुँकुआते हुए छुपने की दौड़भाग 
और प्रणयरत बिल्लियों की नर्म गुर्राहट 
सब कुछ याद हो आया 
जब उठा सुबह 

पानी अब भी बरस रहा है धारासार 
मैंने मन ही मन किसानों से कहा— 
बधाई इस पृथ्वी के अपराजेय योद्धाओ, 
मुझे सीमा पर डटी सैन्य टुकड़ियों से कहीं ज़्यादा 
तुमसे प्यार है तुम हो इसलिए यह पृथ्वी है 
जैसे जंगल सिर्फ़ इसलिए हैं 
क्योंकि आदिवासियों की गर्म साँसें 
उन्हें अब भी थपथपाती हैं। 
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all