'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अंतस्तल, जिसका अर्थ है- हृदय या मन। प्रस्तुत है हरिवंशराय बच्चन की कविता- मुखरित मेरे आँसू का स्वर
अरे है वह अंतस्तल कहाँ?
अपने जीवन का शुभ-सुन्दर
बाँटा करता हूँ मैं घर-घर,
एक जगह ऐसी भी होती,
निःसंकोच विकार विकृति निज सब रख सकता जहाँ।
अरे है वह अंतस्तल कहाँ?
करते कितने सर-सरि-निर्झर
मुखरित मेरे आँसू का स्वर,
एक उदधि ऐसा भी होता,
होता गिरकर लीन सदा को नयनों का जल जहाँ।
अरे है वह अंतस्तल कहाँ?
जगती के विस्तृत कानन में
कहाँ नहीं भय औ’ किस क्षण में?
एक बिंदु ऐसा भी होता,
जहाँ पहुँचकर कह सकता मैं ’सदा सुरक्षित यहाँ’।
अरे है वह अंतस्तल कहाँ?
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से
https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o