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विश्वनाथ त्रिपाठी को क्यों अच्छी लगती है उपेन्द्र कुमार की कविता – संविधान के बाहर एक बहस..

अतुल सिन्हा

Sahitya
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                                                  समकालीन हिन्दी कविता की जब बात की जाती है तो बेशक कई सारे नाम सामने आते हैं, लेकिन जब एक अलग मिजाज की कविताएं और अपनी कविताओं में पौराणिक संदर्भों के साथ आज के दौर को जोड़ने और उन पर बेहद बारीकी से विश्लेषण करने वाले कवि की बात आती है तो इसमें एक अकेले कवि के तौर पर उपेन्द्र कुमार का नाम आता है। उपेन्द्र कुमार इसी 20 सितंबर को पचहत्तर साल के हो चुके हैं। उनके व्यक्तित्व और उनके काव्य संसार को जाने माने लेखक आलोचक और खुद 91 साल के हो चुके प्रो विश्वनाथ त्रिपाठी बेहद बारीकी से देखते हैं। उपेन्द्र कुमार पर अतुल सिन्हा के साथ बातचीत करते हुए त्रिपाठी जी ने उनके कई आयामों का विस्तार से विवेचन किया। उपेन्द्र कुमार की कविताएं भी पढ़ीं और उन पंक्तियों और पात्रों को बहुत बारीकी से देखा और परखा। इस बातचीत में उपेन्द्र कुमार के बहाने त्रिपाठी जी ने साहित्य के तमाम आयामों और दौर की चर्चा की है जो हमें उस दौर की कई शख्सियतों के बारे में विस्तार से बताती है। कबीर, प्रेमचंद औऱ परसाई तक के बारे में उन्होंने चर्चा की है।

त्रिपाठी जी का मानना है कि उपेन्द्र कुमार ने अपने प्रबंध काव्य इंद्रधनुष में जिस तरह तीन पात्रों के जरिये मनुष्य के भीतर के महाभारत को पेश किया है वह अद्भुत है। खासकर ययाति जैसे चरित्र को चुनना अपने आप में उनकी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उपेन्द्र कुमार को अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ कवि बताते हुए त्रिपाठी जी उनकी कविताओं का ज़िक्र करते हैं। बताते हैं कि कैसे एक राजसी सामंती परिवार से जुड़े रहने और प्रशासनिक सेवा में रहने के बावजूद उपेन्द्र जी के भीतर उनका गांव धड़कता है और उनके गांव की नदी उसी तरह बहती है। कैसे उपेंद्र जी अपनी कविताओं में देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान या संसद को देखते हैं और कैसे उनकी कविता संविधान के बाहर एक बहस और कई सारे सवाल खड़े करती है। त्रिपाठी जी उनकी कविता काल अश्व का जिक्र करते हैं और काल की विकरालता के बारे में अपनी राय रखते हैं। त्रिपाठी जी उपेन्द्र कुमार पर बात करते करते कबीर, प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई तक की बात करते हैं। बेशक विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ इस बातचीत का फलक बहुत बड़ा है और इसमें उपेन्द्र कुमार और उनके रचना संसार के बारे में समझने के साथ साथ हिन्दी रचनाकर्म के तीन कालों को भी बेहद बारीकी से समझा जा सकता है।
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यह बातचीत आपके सामने हू ब हू बगैर किसी संपादन के पेश है। इसे आप यूं पढ़ें मानो आप खुद त्रिपाठी जी के सामने बैठकर उन्हें सुन रहे हों।

उपेन्द्र कुमार दशकों से साहित्य साधना कर रहे हैं। 75 वर्ष के होने जा रहे हैं तो सबसे पहले तो मैं उनको बधाई देना चाहता हूं और अपनी सराहना प्रेषित करना चाहता हूं उनके प्रति। बहुत दिनों से मेरा उनका परिचय है। जब परिचय हुआ व्यक्तिगत रूप से तो उससे पहले भी मैंने उनका नाम कवि ओर एक सहृदय साहित्य रसिक और सक्रिय साहित्य सर्जक के रूप में सुन रखा था। वो जिस विभाग में काम करते थे, उस विभाग में मेरे कई सीनियर छात्र काम करते थे। और मेरा ख्याल है कि वो ऐसा समय था जबकि सरकार के हर विभाग में सर्जक साहित्यकारों की एक टोली हुआ करती थी। वो आपस में परस्पर एक दूसरे के साथ साहित्य का आदान प्रदान भी करते थे, चर्चा भी करते थे, सत्संग भी करते थे। वातावरण सजीव बनाए रखते थे.. साहित्य और कलाओं का। उपेन्द्र कुमार जी को राउज एवेन्यू के पास सरकारी निवास मिला था। वहां वे हर होली के मौके पर साहित्यकारों को आमंत्रित करते थे। वहां उस समय जो होता है आमोद प्रमोद उल्लास वो भी होता था, उसके साथ जितना उचित है, मर्यादित ढंग से रस रंजन भी होता था। एक बार मैं भी वहां निमंत्रित हुआ तो मैं भी गया। वहां केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी जैसे बहुत सारे साहित्यकार रहे होंगे। उससे फिर मेरा उपेन्द्र कुमार जी से परिचय बढ़ा। उनके साहित्यिक रूप से जुड़े कवियों से भी मेरा परिचय हुआ। 

ये बहुत बाद में मुझे पता चला कि उनका संबंध बहुत बड़े सामंती परिवार से है और रिश्ते में वो काशी नरेश के कुल से जुड़े हैं। ये सुनकर भी मुझे अच्छा लगा क्योंकि मैं काशी विश्वविद्यालय का विद्यार्थी रहा हूं और काशी नरेश वहां के चांसलर हुआ करते थे। वहां के हिन्दी विभाग के जो अध्यक्ष थे आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, वो उन्हीं काशी नरेश के द्वारा संस्थापित थे। रामचरित मानस के संस्करण का संपादन आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने किया था और वो वहां अक्सर जाते थे.. काशी नरेश के नगर में। और उस संस्करण का उद्घाटन या लोकार्पण जो भी कहें, वो पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। तो ये मुझे बड़ा अच्छा लगा और एक रोमांच और रोमांस का भाव आ गया उनके साथ संबंधों में। इसलिए जब वो कुछ दिनों के बाद मदन कश्यप के साथ दिलशाद गार्डन के डियर पार्क में आए, जहां हमलोग इकट्ठा हुआ करते थे। उस समय दिलशाद गार्डन में अनेक साहित्यकार थे.. राकेश तिवारी, आलोक पुराणिक, विभांशु दिव्याल, विजय जी कहानीकार थे, शिवमूर्ति भी आते थे, राम कुमार तिवारी आते थे, हरिनारायण जी, रमेश आजाद, भारतेन्दु मिश्र, रमेश प्रजापति... बाद में उसमें जेके सिंह, कमलेश वगैरह भी इकट्ठे होते थे..बहुत लोग आते थे.. तो उपेन्द्र जी भी आने लगे। उतनी दूर से वो आते थे, उनके साथ एक ड्राइवर और उनका एक सेवक भी आता था। और वो समोसे बनवा कर लाते थे और अपने यहां से चाय बनवा कर भी लाते थे...गरमा गरम। उतनी अच्छी चाय और उतने अच्छे समोसे यहां दिल्ली में नहीं मिलते हैं। समोसे का कल्चर बनारस, इलाहाबाद यूपी, बिहार में है। उतने अच्छे समोसे दिल्ली में नहीं मिलते। वो उस तरह के समोसे लाते थे। चाय गरम होती थी. और अपने आप में असंभव को संभव करके दिखाते थे। इतना ध्यान रखते थे। गपबाजी होती थी। उनकी सज्जनता और सहृदयता का पता चलता था। और ये भी पता चला कि वो अच्छी और सही बात के लिए संघर्ष भी कर सकते थे और झगड़ा भी कर सकते हैं। एक बार कुछ प्रोपर्टी डीलर यहां उपद्रव करना चाहते थे, हमारा जो मंडल है उसके सदस्य के साथ मारपीट की नौबत आ गई तो मैंने देखा कि उपेन्द्र कुमार बिना किसी की परवाह किए हाथापाई करने को तैयार हो गए। तुरंत पुलिस को बुलाया। तो वो रूप मैंने देखा उपेन्द्र कुमार जी का कि जो सही बात के लिए जोखिम भी बहुत ले सकते हैं। उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष का मेरे ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा. तो इससे उनके साहित्य के प्रति भी मैं आकृष्ट हुआ।

मेरी अच्छी या बुरी आदत ये है कि मैंने जिन लोगों की कविताओं पर लिखा है, उनके जीवन के बारे में अगर मेरी अच्छी धारणा बनती है तभी मैं लिखता पढ़ता हूं। मैं साहित्य या साहित्यकार को उसके जीवन से अलग करके, उसके साहित्य की विवेचना कर ही नहीं सकता। परसाई को मैं बहुत दिनों से पढ़ा करता था। लेकिन जब मैं जबलपुर गया, परसाई को जब मैंने देखा तो बाप रे बाप.. मैंने देखा कि वो आदमी विकलांग बना कमरे में लेटा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर घर में काम करने वाला सफाई कर्मचारी तक से वह उसी भाव से सबसे मिलता है..और सबकी चिंता करता है वहां बैठकर।

फिर उनके व्यंग्य निबंधों को नए ढंग से पढ़ने लगा। और जब मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि ये छोटे छोटे निबंध नहीं ये तो महाकाव्य हैं। और मैं इन निष्कर्षों पर पहुंचा अतुल जी.. मैं चाहता हूं और इसकी घोषणा कर रहा हूं कि ये जो पूरा व्यंग्य निबंध हैं परसाई के ये तो देश की गाथा हैं।

मैं समझता हूं कि ये उपेन्द्र जी को भी अच्छा लगेगा कि उनके संदर्भ में बात करते करते परसाई की बात हो गई। देश के स्वतंत्रता-स्वाधीनता आंदोलन के समाज को देखना हो तो आप प्रेमचंद को पढ़िए..और स्वाधीनता आंदोलन के बाद के समाज को देखना है तो आप परसाई को पढ़िए।

हिन्दी में तीन व्यंग्यकार और रचनाकार हैं.. जो कुछ कह रहा हूं, पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं.. कबीर, प्रेमचंद और परसाई। बीच में भारतेंदु और निराला का नाम भी आता है, लेकिन मुख्य रूप से नहीं। और वो मेरे ख्याल से प्रेमचंद के बाद हिन्दी के सबसे बड़े गद्यकार परसाई थे।

तो मैं ये कह रहा हूं कि जब मैंने परसाई का जीवन देखा.. अपना जीवन कैसा होम किया उन्होंने.. अपने बहन के लिए बच्चों के लिए शादी नहीं की.. उनके पिता मर गए थे, बहन की शादी करनी थी.. उन्हें मास्टर की नौकरी करनी पड़ी... विवाह योग्य बहन रहे कहां... इसलिए उन्होंने शादी नहीं की।

तो मेरे कहने का संदर्भ ये है कि उपेन्द्र जी जो हैं..इतने बड़े परिवार से जिसका संबंध है, सामंती मनोवृत्ति का आदमी होना चाहिए.. लेकिन ये आदमी अपने  मित्र के लिए, अपने मिलने जुलने वालों के लिए इतना बड़ा जोखिम भी उठा सकता है, मारपीट कर रहे थे.. दो चार हाथ इनपर भी पड़ सकता था, या हो सकता है ये भी पुलिस हिरासत में हो जाते.. इन्हें क्या जरूरत पड़ी थी कि हमलोगों के सम्मान की रक्षा करने के लिए ऐसा करते.. तो मेरी उपेन्द्र जी के प्रति मेरी इज्ज़त बढ़ गई।

कुछ तो ये कि मदन कश्यप मेरे नजदीकी मित्र हैं और उपेन्द्र जी उनके मित्र हैं तो मित्रों के मित्र तो वैसे भी मित्र होते हैं। फिर मैंने उनकी कविताएं पढ़ीं। दो तीन ऐसे मौके आए जब उनकी कृतियों का लोकार्पण हुआ। काफी लिखा गया इनके बारे में। इनकी एक सफलता और सिद्धि है कि दशकों तक सर्जक बने रहे। वो साहित्य पर भी निर्भर है। मुख्यत: तो साहित्य पर ही निर्भर है। लेकिन वो साहित्य के अलावा भी और कई चीजों पर निर्भर है। लेकिन उपेन्द्र जी अपने आप में सर्जना का स्त्रोत बने हुए हैं। वागदेवी के मंदिर से आपका संबंध हटा नहीं। आज के ज़माने में। क्योंकि जीवन जो है वो तमाम प्रलोभनों की बाधाएं पैदा करता है। अब मुझे जो उनके साहित्य का सबसे प्रिय रूप पसंद है वो है उनकी एक कविता है.. मेरे गांव की नदी..

कविता मैं आपको पहले पढ़कर सुनाता हूं...

मेरे गांव की नदी
पहचान है इतिहास और गांव के सौहार्द की
बहती हुई आती है कभी
मेरे पिछवाड़े मुझे ... करती हुई
सीवान के पास तो कभी दूर
घर घर में सदा बहने वाली
मेरे गांव की नदी बहती है सदियों से
बहती है नदी मेरे रेगिस्तान में
प्रेमिकाओं में बहती है पहचान
मेरे रक्त में
अपने आप पहुंचती है आज भी
उसी बहाव से गांव में
मेरे शहरी निवास में स्मृति के        
तटबंधों से छोड़ती है पानी

(ये पंक्तियां सुनाते हुए त्रिपाठी जी कहीं खो जाते हैं फिर इसके बहाने उपेन्द्र कुमार के बारे में अपने तरीके से समझाते हैं।)

... एक तो आप इसमें देखते हैं कि यह आदमी आधारत: और आद्यंत अपने जड़ से जुड़ा हुआ है और अपनी जीवन यात्रा को, अपने नैतिक संसार को या उसकी भी यात्रा को और सबसे बड़ी बात ये है कि अपनी प्रेमिकाओं को, उस पूरे संसार को, जीवन में इतिहास को कुरेदने, जीवन में जो कुछ भी उसकी उपलब्धियां हैं औऱ जो स्मरणीय हैं, जो उपलब्धियां होती हैं वो स्मरणीय होती हैं, असफलताएं भी स्मरणीय होती हैं... इसलिए मैंने कहा कि अपनी सफलता असफलता सबको उसने अपने गांव की नदी से जोड़ा है, उसकी स्मृति से जोड़ा है...ये रचनाकार की ईमानदारी है.. और ईमानदारी के साथ साथ एक दूसरी चीज है जो कि बहुत मूल्यवान है। मूल्यवान वो है कि जब वो कहते हैं कि वो स्मृति में है मेरे.. वो नदी.. तो वो साथ साथ ये भी स्वीकार करते हैं कि अब उनका उतना संबंध नहीं रह गया है साक्षात.. अंदर तो है.. लेकिन बाहर से उतना संबंध नहीं रह गया है। तो ये रचना की ईमानदारी है कि वो अपने को भी स्पेयर नहीं करती है। और भाषा का जो मैजिक होता है कि आप कहते तो कुछ हैं, लेकिन आप समझ नहीं पाते कि और आप क्या क्या कहने जा रहे हैं जो नहीं कह रहे हैं वो शायद ज्यादा आप कह रहे हैं। इस मामले में भाषा और शाश्वत कविता बड़ी दोमुंही होती है.. जब आप ये कहते हैं कि जुड़ी हुई है, मेरे गांव की नदी... वगैरह वगैरह.. तो आप ये भी बता देते हैं कि अब आपका उतना सजीव संसर्ग नहीं रह गया है। और उसका शोक भी कहीं न कहीं आपके मन में बना हुआ है। तो मैं आपसे बताऊं कि जब मैं उपेन्द्र जी की कविताओं पर बात करता हूं तो सबसे पहले मेरा ध्यान इस बात पर जाता है।

(त्रिपाठी जी कुछ देर रूकते हैं। पानी का एक घूंट पीते हैं। फिर उपेन्द्र जी की एक और कविता का ज़िक्र करते हैं। त्रिपाठी जी उनके संग्रह से तलाश कर कविता का शीर्षक बताते हैं – काल अश्व। फिर वो इस कविता की पंक्तियां भी पढ़कर सुनाते हैं।)

 
सप्त वल्गाओं से नियंत्रित
दौड़ते रहते हैं सतत
न थकते न जीर्ण होते
अक्षय बलवान हैं काल अश्व वेगवान
घूमते रहते हैं सर्वत्र
समस्त भुवनों में
चकित करते हुए अनुष्ठानों को
ब्राह्मणों प्राणियों को और अदृश्य देवताओं को
आगामी भविष्य को अभिमंत्रित करते हुए


 यह काल

अपनी सात नाभियों की धुरी में
अमृत कलश लिए देखता है प्रमाण स्वरूप
रचने और रचे जाने के बीच अपने इन घोड़ों बछेड़ों को
जो अबोध निरंतरता में विद्युतगति से दीखते हैं दौड़ते चतुर्दिक

(कविता की पंक्तियां पढ़ने के बाद त्रिपाठी जी कुछ देर बहुत गंभीर मुद्रा में रहते हैं और काल के बारे में विस्तार से समझाते हैं...)


सच्ची बात ये है कि समय और काल मनुष्य की चेतना का बहुत बड़ी चिंता है। जो सचेतन है वो काल, उसके परिवर्तन, उसकी अनंतता का विचार जरूर करता है, उससे वो ग्रस्त होता है। वो अपनी ओर उठाकर ले जाता है और काल एक ऐसा बोध है जो सर्वस्त्र लागू होता है। ऐसी कोई चीज है नहीं जो काल से बच सके। और समस्त कला जो है वो अपने ढंग से उस काल से ऊपर उठने की या उबारने की कोशिश करती है। मुझे याद पड़ती है केदारनाथ सिंह की कविता जो बिल्कुल इसी विषय पर है। उन्होंने काल को एक बहुत द्रुत गति के घोड़े से जोड़ा है और बाद में आकर कि अरे कोई रोके इसे, कोई थामे इसे। वस्तुत: जो ये काल अश्व का रूपक है। हो सकता है कि उपेन्द्र कुमार जी ने तो अपने ढंग से उसे रचा होगा। केदारनाथ सिंह ने जो वो कविता लिखी थी।

(फिर वो केदार जी के बारे में और उनसे अपने संबंधों के बारे में बताने लगते हैं और उसी के साथ संदर्भों सहित उपेन्द्र कुमार की इस कविता के बारे में बात करते हैं)

केदारनाथ सिंह क्लासफेलो थे हमलोगों के। हमारे बड़े मित्र थे। प्राय: जो वो कविता लिखते थे तो सबसे पहले सुनने वाला मैं ही होता था कुछ दिनों तक। उनको जब मैंने ये याद दिलाया कि ये कालसूप्त है वेद का, जहां उन्होंने वेदों में एक वेद में काल का रूपक किसी अश्व के रूप में जो सहस्श्र पैरों से दौड़ता हुआ चला जा रहा है काल...निनाद करता हुआ, फिचकुल मारता हुआ काल जा रहा है।

तो जो वो काल का बोध होता है अतुल जी वो सारे बोधों का ढक लेता है। जबतक हम जीवित हैं, चेतना में है, अस्मिता है हमारी, हिमालय है, इतिहास है, फलाने हैं, ढिमाके हैं। तो काल ही एक ऐसी चीज है जिसके सामने मनुष्य बेबस है और कुछ कर नहीं सकता। और इस विवशता को या इस पराजय को स्वीकार करने के लिए मनुष्य अनेक तरह से अपने मन को फुसलाता है। जो फुसलाना दरअसल मनुष्य के पराजय का लक्षण नहीं है बल्कि उसके यवदात्त का लक्षण है, अपनी विवशता को स्वीकार करने की एक ... उदारता तो इसको नहीं कह सकते.. लेकिन ये भी एक बड़ी बात है कि इस तरीके से आदमी अपनी पराजय को स्वीकार करता है.. तो ये काल अश्व कविता पढ़के मुझे इतनी बातें आईं।

(त्रिपाठी जी उपेन्द्र कुमार की एक और कविता का ज़िक्र करते हैं। इस कविता को उपेन्द्र जी की लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था के साथ साथ मौजूदा सियासत के असली चेहरे के संदर्भ में परिभाषित करते हैं।)

 

और उनकी एक और कविता है... संविधान से बाहर एक बहस...

ये जनतांत्रिक चेतना की एक गंभीर कविता है.. कि

जो लोकतंत्र है
जो जनतंत्र है
वो इस विश्व का
आधारभूत सौंदर्य क्षंद है..


ये उपेन्द्र जी की कविता की चिंता है ... कि बाहर जो है आप पक्षी को बोलने की इजाजत देंगे या नहीं देंगे, संविधान तो छोड़ दीजिए... आप वसंत को आने की इजाजत देंगे या नहीं देंगे... जब लोकतंत्र पर हमला होता है.. तो आदमी के लिए उसका केवल लोकतांत्रिक जीवन ही नहीं, इलेक्शेन वेलेक्शन ही नहीं, राजनीतिक जीवन ही नहीं, उसकी पूरी चेतन संसार पर हमला होता है....और वो अपने आपको जकड़ा हुआ महसूस करता है... इसलिए जनतांत्रिकता जो है, जो आजादी है वो केवल राजनीति की वस्तु नहीं है मूलत: वह हमारी सांस्कृतिक चेतना की बात है.. और मूलत: वह हमारी चेतना की भूमि है.. ये कविता इसलिए मुझे बहुत अच्छी लगी।

(त्रिपाठी जी इसके बाद उपेन्द्र जी के व्यक्तित्व, उनके रचनाकर्म पर एक विस्तृत और सारगर्भित टिप्पणी करते हैं। उपेन्द्र कुमार के चर्चित प्रबंध काव्य इंद्रप्रस्थ का विस्तृत विश्लेषण करते हैं। उपेन्द्र जी ने जिस तरह इसे तीन पात्रों के ज़रिए रचा है, उन पात्रों की खासियत बताते हैं और अंत में उन्हें शुभकामनाएं देते हैं।)

इतने दिनों तक कविता लिखते हुए उपेन्द्र जी ने जीवन की पूरी यात्रा की है, चिंतन किया है, अनुभव प्राप्त किया है, पढ़ाई लिखाई की है, सुशिक्षित व्यक्ति हैं, सहृदय व्यक्ति हैं, प्रेम किया है, गृहस्थ हैं, इन सारे अनुभवों को अपने इस जीवन यात्रा को, चिंतन यात्रा को, उस क्रम को.. उन्होंने एक ठोस प्रबंधात्मक रूप देने का प्रयास किया है इंद्रप्रस्थ में.. लंबी कविता है... अब प्रबंध काव्य तो पहले जैसे रूप में लिखा नहीं जाता... साकेत या कामायनी जैसा... कुछ बाद में नागार्जुन ने प्रयास किया है लेकिन अब ज्यादातर जो प्रबंध लिखे जाते हैं ‘राम की शक्ति पूजा’ के बाद.. निराला का.. या मुक्तिबोध की जैसे ‘अंधेरे में’ कविता है। जिसमें चिंतन और स्थूल घटनाओं का वर्णन है दोनों साथ साथ चलता रहता है। उसी काव्य रूप में ये कविता लिखी गई हैं – इंद्रप्रस्थ। इंद्रप्रस्थ मूलत: एक ऐतिहासिक नगर है। और उस ऐतिहासिक नगर को प्रतीक बना कर भूत, भविष्य, वर्तमान जीवन की तमाम ग्रंथियां और जटिलताएं.. और साहित्य भी इतिहास भी। सबकुछ उसी में एक साथ प्रकट करने का साहित्यिक प्रयास है। अनेक पात्र हैं। मैं समझता हूं कि संसार का शायद ही ऐसा कोई दूसरा प्रबंध काव्य हो जिसमें इतने पात्र हों जितने पात्र महाभारत में हैं। और महाभारत में तो कहा गया है कि जो यहां नहीं है वो कहीं नहीं है। ये उपेन्द्र जी की एक रचनात्मक सफलता मानता हूं मैं कि महाभारत उनके जीवन में भी है, उनके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समझ में भी है, वो उनके सामान्य रोजमर्रा के जीवन में भी है। लेकिन उस सबको उपेन्द्र कुमार जी ने तीन पात्रों में समाविष्ट कर दिया है... वो तीन पात्र है – पुरुलवा, ययाति और उर्वशी। अब आप ये देखिए... पुरुलवा अपनी विवाहिता शूलरी की उपेक्षा की.. औऱ उर्वशी उसको छोड़कर चली जाती है.. छोड़ कर तो चली जाती है.. लेकिन कामायनी के अनुसार मनु को जन्म देकर जाती है, भानु को जन्म देकर जाती है... तो एक प्रेम का जो उन्माद होता है औऱ मनुष्य कितना हाथ पांव झटकता है प्रेम के उन्माद में.. जीवन में.. और इतिहास में भी होता है.. ये तो उसका प्रतीक है।       

ययाति विचित्र चीज का प्रतीक है। ययाति क्या करता है ये आप देखिए। ययाति को प्रतीक बनाना बहुत बड़ी बात है। और अभी तक मैं समझता हूं कि उपेन्द्र जी इस मामले में अकेले हैं कि ययाति को उन्होंने एक पात्र के रूप में चुना ये बहुत बड़ी बात है उनके काव्य और कवि के रूप की। एक प्रबंध रचनाकार के रूप में। ययाति आत्मघाती है। वो संतानघाती और भविष्यघाती है। वो अपने पुत्र को वृद्ध बनाकर उसका यौवन लेकर ये करता है। इतिहास और माइथॉलॉजी में ऐसा पात्र और कहीं नहीं है। और उस पात्र को प्रतीक बनाकर भी शायद मेरे ख्याल से किसी ने नहीं लिखी है। तो ये बहुत बड़ी बात है कि आजकल का जो मनुष्य है वो अपने भविष्य को किस तरीके से आघात पहुंचा रहा है। बिल्कुल भविष्यहीन हो रहा है आजकल का मनुष्य और ये बिल्कुल सच है ये जो हमारा पारिवारिक रूप बदल रहा है संयुक्त परिवार का। अब पति पत्नी भी... बल्कि आज जो स्त्री है वो आद्या योनि ही नहीं रह जाएगी और भविष्य में संतान को आगे बढ़ाने के लिए वो रिफ्यूज़ कर रही है और कहती है कि नहीं मैं नहीं कर रही ये काम। अब पिता पुत्र का संबंध क्या होगा, भाई-बहन का क्या होगा, बेटी का क्या होगा.. आज से बीस साल..पचास साल बाद क्या होगा, ये बड़ा अनिर्धारित सा है। तो ये मैं समझता हूं कि ये एक बहुत बड़ी सफलता है उपेन्द्र कुमार जी की कि ययाति को इस प्रतीक के रूप में स्थापित करना और तीसरे पात्र हैं नहुष जो त्रिशंकु की तरह बीच में अटके हुए हैं। तो आप ये देखते हैं कि इतिहास की ऐसी जो व्याख्या है तो इन तीन प्रतीकों में इंद्रप्रस्थ में किया वो मैं उनकी सफलता मानता हूं।

इन सारी बातों को कहने के बाद मैं सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं कि उपेन्द्र जी मूलत: उनके ऊपर कामायनी का तो प्रभाव है ही, लेकिन दिनकर की उर्वशी का शायद सबसे ज्यादा औऱ गहरा असर है। और वो मूलत: उस रूप में तो नहीं, लेकिन उनकी रचनाओं में भी जो शारीरिक सौंदर्य है, प्रेम के प्रति शारीरिकता के प्रति जो उन्माद है और उसकी व्यर्थता का भी एहसास साथ में है, उसकी असफलता का भी एहसास, संतान, संताप.. किसी से अनंत काल के लिए जुड़ न पाने का जो अवसाद है, वो मुख्य रूप से बहुत ज्यादा है। और मैंने देखा कि उनके ऊपर दिनकर का काफी असर है। और कवियों का भी काफी असर है। उन्होंने केदार नाथ सिंह की कविताओं को काफी ध्यान से पढ़ा है।

(और अंत में प्रो. विश्वनाथ त्रिपाठी ने बहुत ही स्नेह के साथ उपेन्द्र कुमार को उनके 75 साल के होने पर अपने खास अंदाज़ में बधाई देते हैं और बेहद आत्मीयता के साथ मुस्कराते हुए आशीर्वाद देते हैं)

तो ऐसे अवसर पर जब वो पचहत्तर वर्ष के हो रहे हैं और अभी उनका काफी जीवन पड़ा हुआ है। और मैं उम्र में बड़ा हूं उनसे और यकीन न करने के बाद भी ये तो सच है कि मैं ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ हूं.. तो चाहूं तो आशीर्वाद भी दे सकता हूं... और उपेन्द्र जी ने ऐसा बहुत कुछ किया भी है कि उन्हें आशीर्वाद दिया भी जानी चाहिए.. शुभकामना करता हूं कि वो बहुत दिनों तक मां सरस्वती की आराधना करते रहेंगे।   
 
2 वर्ष पहले
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