1 अक्टूबर 1919 को उत्तर-प्रदेश के सुल्तानपुर में पैदा हुए असरार उल हसन ख़ान एक दिन सिनेमा के नामी गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी होंगे ऐसा उन्होंने ख़ुद भी नहीं सोचा था। एक इंटरव्यू के दौरान मजरूह बताते हैं कि उनके घर में इल्म का कोई माहौल न था। लेकिन वे मानते हैं कि यह हुनर उन्हें प्राकृतिक ही मिला था कि वे काफ़िये या मीटर पकड़ कर उन्हें ठीक कर लेते थे। मजरूह के पिता पुलिस में थे लेकिन बच्चों को अंग्रेज़ी की जगह अरबी/फ़ारसी की तालीम देना चाहते थे। इसलिए मजरूह की पढ़ाई मदरसे में हुई इसका फ़ायदा ये हुआ कि वे अरबी, फ़ारसी के अच्छे जानकार हो गए। इसके बाद हकीम बनने के लिए दवाईय़ों का अध्य्य़न किया। इस बीच अपने शेर ओ सुखन के शौक़ को ज़िंदा रखा और मुशायरों में कलाम पढ़ने लगे। पेश है मज़रूह के चुनिंदा कलाम
ऐसे हँस हँस के न देखा करो सब की जानिब
लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं
देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
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कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा
जफ़ा के ज़िक्र पे तुम क्यूँ सँभल के बैठ गए
तुम्हारी बात नहीं बात है ज़माने की
रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं उन्हीं के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह
बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते
ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई 'मजरूह'
हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे
तिरे सिवा भी कहीं थी पनाह भूल गए
निकल के हम तिरी महफ़िल से राह भूल गए
दिल की तमन्ना थी मस्ती में मंज़िल से भी दूर निकलते
अपना भी कोई साथी होता हम भी बहकते चलते चलते
'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह
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