बेईमान सजे बजे हैं
तो क्या हम मान लें
कि बेईमानी भी एक सजावट है
क़ातिल मज़े में हैं
तो क्या हम मान लें
कि क़त्ल करना मज़ेदार काम है
मसला मनुष्य का है
इसलिए हम तो हरगिज़ नहीं मानेंगे
कि मसले जाने के लिए ही बना है मनुष्य..
दमन, अन्याय और शोषण के ख़िलाफ़ यह आवाज़ है वीरेन डंगवाल की। वही वीरेन डंगवाल जिन्होंने आज ही के दिन (05 अगस्त) टिहरी गढ़वाल के एक अभिजात्य परिवार में जन्म लिया लेकिन उनकी कविताओं में हमेशा आम आदमी बोलता रहा। वीरेन जी एक जज के बेटे थे। स्वयं बरेली कॉलेज बरेली में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष रहे। कानपुर में दैनिक अमर उजाला के तीन वर्ष तक संपादक रहे। अमर उजाला के सलाहकार व डायरेक्टर भी रहे लेकिन एलीट क्लास वाली उनमें ठसक न थी। उनका मिज़ाज भी उनकी कविताओं जैसा ही था। वे अभिजात्य वर्ग के खिलाफ लिखते-बोलते रहे।
उड़नपरी पीटी ऊषा के ट्रोलर्स को दिया करारा जवाब
जब विश्व में भारत का गौरव बढ़ाने वाली उड़नपरी पीटी ऊषा जी के सादगी भरे व्यवहार को नजर-अंदाज कर टेबल मैनर्स के लिए ट्रोल किया गया तो उन्होंने उस समय के ट्रोलर्स को पीटी ऊषा शीर्षक से एक कविता लिखकर करारा जवाब दिया:-
खाते हुए मुँह से
चपचप की आवाज़ होती है
कोई ग़म नहीं
वे जो मानते हैं
बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता
दुनिया के सबसे ख़तरनाक खाऊ लोग हैं..
गहरी और मारक है काव्य-संवेदना..
रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और शमशेर जैसे महान कवि- साहित्यकारों के नाम से जुड़े पुरस्कारों और सम्मानों के साथ साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित वीरेन डंगवाल की काव्य-संवेदना बहुत गहरी और मारक है।
'कैसी ज़िंदगी जिए' कविता में वे कहते हैं:-
पूछते हैं पिछले दंगों में कत्ल कर डाले गए लोग/ अब तक जारी इस पशुता का अर्थ/ कुछ भी नहीं किया गया/ थोड़ा-बहुत लज्जित होने के सिवाय/ प्यार एक खोई हुई ज़रूरी चिट्ठी/ जिसे ढूँढते हुए उधेड़ दिया पूरा घर/ फ़ुर्सत के दुर्लभ दिन में/ विस्मृति क्षुद्रता का जघन्यतम हथियार/ मूठ तक हृदय में धँसा हुआ पछतावा..
*वर्तमान के प्रति क्षोभ और आक्रोश किंतु निराश नहीं..*
'हमारा समाज' कविता में एक जगह वीरेन दा सवाल करते हैं:-
किसने आख़िर ऐसा समाज रच डाला है
जिसमें बस वही दमकता है जो काला है..
वहीं महाप्राण निराला की स्मृति में लिखी गई कविता द्वारा वे उजले दिनों के प्रति उम्मीद भी जगाते हैं:-
ये रक्तपात, ये मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का जरिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते में
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है
सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे पार इसे कर जाएंगे
मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है
आए हैं जब हम चलकर इतने लाख वर्ष
आगे भी चल कर ही जाएंगे
आएंगे, उजले दिन ज़रूर आएंगे
*'यही तुम थे' क़िताब में दर्ज़ हैं तमाम अनछुए किस्से*
जाने माने कवि-लेखक पंकज चतुर्वेदी जी कानपुर में वीरेन जी के बेहद नजदीक रहे थे। 28 सितंबर, 2015 को वीरेन जी के आकस्मिक निधन ने पंकज चतुर्वेदी जी को भाव-विगलित कर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर उनकी स्मृतियों को साझा करना शुरू किया और यह सिलसिला 'यही तुम थे' शीर्षक से पुस्तकाकार होकर प्रकाशित हुआ।
इस पुस्तक में वीरेन दा के दैनिक जीवन के तमाम अनछुए पहलू और किस्से समाहित हैं। मसलन मई-जून की जलती गर्मी में वीरेन दा को किस तरह ठंडी बियर ताज़गी और ऊर्जा प्रदान करती थी। वह पंकज जी से कहते थे कि यार! तुम तो 40 रुपए में जन्नत खरीद लाए हो..
इस क़िताब को पढ़कर आपको यह भी पता लगेगा कि वीरेन जी शादी को बंधन और इंसान की फ्रीडम में बाधा मानते थे। वह शादी से बचने के लिए कैंची (नैनीताल) भाग गए थे। हालांकि बाद में मामा जी के मनाने पर वह वापस आए। उन्होंने शादी की और उनका विवाह बेहद सफल भी रहा।
यूँ देखा जाए तो वह जीवन में हर मोर्चे पर सही और सफल रहे। एक पति के रूप में, एक दोस्त के रूप में, एक पत्रकार के रूप में, एक इंसान के रूप में और एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में भी..
वे अपनी एक कविता की अंतिम पंक्तियों में कहते भी हैं:-
एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा
उनका यह जीवन- दर्शन उनकी कविता 'इतने भले नहीं बन जाना साथी' में भी ख़ूब झलका है। ये पंक्तियाँ समूची मानव जाति को अर्थ पूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं:-
किसी से कुछ लिया नहीं
न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जीवन जिया तो क्या जिया