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अज्ञेय के 5 चुनिंदा उद्धरण

काव्य डेस्क

Sahitya
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                                                  अकेले बैठना, चुप बैठना—इस प्रश्न की चिंता से मुक्त होकर बैठना कि ‘क्या सोच रहे हो?’—यह भी एक सुख है। 
 
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एक निगाह से देखना कलाकार की निगाह से देखना नहीं है।

किसी को ठीक-ठीक पहचानना है तो उसे दूसरों की बुराई करते सुनो। ध्यान से सुनो। 

सोचने से ही सब कुछ नहीं होता—न सोचते हुए मन को चुपचाप खुला छोड़ देने से भी कुछ होता है—वह भी सृजन का पक्ष है। कपड़े पहनने ही के लिए नहीं हैं—उतार कर रखना भी होता है कि धुल सकें। 

नकार के मौन में तूफ़ान की-सी गडग़ड़ाहट हो सकती है! 
2 वर्ष पहले
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