दुष्यंत कुमार हिंदी साहित्य में एक बड़ा नाम है। इन्होंने हिंदी भाषा में गजलों को पेश करते हिंदी साहित्य में एक नई बयार बहाई थी। दुष्यंत से पहले शमशेर बहादुर, निराला, हरिकृष्ण प्रेमी, शंभुनाथ शेष, चिरंजित ने गजलें पेश की लेकिन ये कवि उसे उर्दू से अलग नहीं कर पाए थे। बलवीर सिंह रंग, बालस्वरूप राही, सूर्यभानु गुप्त ने हिंदी गजलों को लोकप्रिय बनाया था। लेकिन दुष्यंत कुमार ने गजल को हिंदी कविता की मुख्य धारा में शामिल करने की पुरजोर कोशिश की और वह इसमें पूरी तरह सफल भी हुए।
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए
'साए में धूप' की 52 गजलों को पढ़ने के बाद अधिकांश गजलकार भ्रमित हो गए...
इसी बीच दुष्यंत कुमार की 'साए में धूप' की बेहतरीन बावन गजलों को पढ़ने के बाद अधिकांश गजलकार दिग्भ्रमित हो गए। और कच्ची गजल कहने लगे। जिसका विरोध होना स्वाभाविक था। हुआ यूं कि नए कवियों ने दुष्यंत कुमार की गजल यात्रा को जाने और समझे बिना उनकी तरह गजलों की रचना करने का प्रयास किया। मगर वह सफल नहीं हुए। अगर दुष्यंत की इस कठिन यात्रा पर वह गहन-विचार करते हुए अपनी कलम चलाते तो उन्हें दुविधा में नहीं फंसना पड़ता। उन्होंने दुष्यंत के 25 सालों के संघर्ष और उनकी अन्य रचनाओं पर ध्यान दिए बिना सिर्फ 'साए में धूप' के जरिए दुष्यंत कुमार बनने की कोशिश करने लगे।
चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी
फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी
कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी
सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शमअ-सी जल रही होगी
तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी
जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी
जब छंद में कहने वाले अधिकांश कवि गजलों को पेश करने लगे...
हिंदी साहित्य में एक दौर ऐसा भी आया था जब छंद में कहने वाले अधिकांश कवि गजलों को पेश करने लगे। इस दौर में हिंदी पत्रिकाओं में भी हिंदी गजलों को काफी जगह मिलने लगी। काव्य मंच में गजलों को स्थान मिलने लगा। हर नया पुराना कवि गजलें कहने लगा। हम ये कह सकते हैं कि दुष्यंत कुमार ने जिस दौर की शुरुआत की थी उसमें उर्दू की गजल को हिंदी के कवि-गीतकार अपने साथ उड़ा ले गए। इस दौर में उर्दू रचनाकारों के मन में हिंदी गजलों के प्रति स्नेह नहीं उमड़ा बल्कि वह इस पर वैचारिक टिप्पणी करने से भी नहीं चूके।
परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं
हवा में सनसनी घोले हुए हैं
तुम्हीं कमज़ोर पड़ते जा रहे हो
तुम्हारे ख़्वाब तो शोले हुए हैं
ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो
क़ुरान-ओ-उपनिषद् खोले हुए हैं
मज़ारों से दुआएँ माँगते हो
अक़ीदे किस क़दर पोले हुए हैं
हमारे हाथ तो काटे गए थे
हमारे पाँव भी छोले हुए हैं
कभी किश्ती, कभी बतख़, कभी जल
सियासत के कई चोले हुए हैं
हमारा क़द सिमट कर मिट गया है
हमारे पैरहन झोले हुए हैं
चढ़ाता फिर रहा हूँ जो चढ़ावे
तुम्हारे नाम पर बोले हुए हैं
इसके बाद भी दुष्यंत की गजलों का कारवां बढ़ता रहा...
इधर हिंदी के नए कवियों में गजल की यह शैली अत्यंत सीमित लगी तथा आलोचकों ने अधिक टिप्पणियां भी नहीं की। इसके बाद भी दुष्यंत की गजलों का कारवां बढ़ता रहा और वह अपनी इस विधा में अपार लोकप्रिय होने लगे। इसका यह परिणाम हुआ कि हर दूसरा गजलकार दुष्यंत कुमार बनने लगा। ऐसे परिवर्तन को देखते हुए अकबर इलाहाबादी का एक शेर याद आता है।
बढ़ाई शेख ने दाढ़ी हजार सन की सी
मगर वो बात कहां मौलवी-मदन की सी
दुष्यंत के मानसिक, राजनैतिक, साहित्यिक सरोकार काफी गहरे थे...
कईयों ने तो यहां तक पांच और छह संकलन प्रकाशित करवा दिया। उन्होंने दुष्यंत की 'सूर्य का स्वागत', 'आवाजों के घेरे में', 'एक कंठ विषपायी' की कविताओं पर ध्यान देने की कोशिश नहीं की। वास्तविकता यह है कि दुष्यंत के मानसिक, राजनैतिक, साहित्यिक सरोकार काफी गहरे थे। उनके गीतों, कविताओं और गजलों ने हमेशा इन सरोकारों पर गहन नजर डाली। उनका संघर्ष उनका यह शेर बताता है।
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो
इस शेर को संघर्षरत हर आदमी जिंदगी में एक न एक बार कहा या बोला जरूर होगा। लिहाजा हिंदी में गजलों के सूत्रधार दुष्यंत कुमार की तरह रचना करने से पहले उनके काव्य के संघर्ष को समझना जरूरी होगा।
साभार-हमारे लोकप्रिय गीतकार, दुष्यंत कुमार
संपादित-शेरजंग गर्ग
8 वर्ष पहले