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हिंदी दिवस: ये नग़मा आपको अपनी हिंदी संस्कृति से रूबरू कराएगा...

काव्य डेस्क

Mere Azeez Filmi Nagme
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                                                  1967 में रिलीज फिल्म 'बूंद जो बन गए मोती' में सदाबहार अभिनेता जितेंद्र पर फिल्माया गीत 'ये कौन चित्रकार है' हिंदी दिवस पर विशेष रूप से याद किया जाना चाहिए। वजह है कि इस गीत में हिंदी के शब्दों का उम्दा उच्चारण है। मुकेश के गाए इस नगमें को भरत व्यास ने लिखा है। संगीत सतीश भाटिया ने दिया है। जितेंद्र का शांत मन और गीत में संस्कारशील शब्द मुझे इस गीत का मुरीद बनाते हैं।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार...

हरी भरी वसुंधरा पर नीला नीला ये गगन
के जिसपे बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
दिशाएं देखो रंग भरी
दिशाएं देखो रंग भरी चमक रहीं उमंग भरी
ये किसने फूल फूल से किया श्रृंगार है
ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार


गीत में प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन किया गया है। वसुंधरा, क्षितिज, वायु, हरियाली, पुष्प, जल सहित अन्य मूल्यवान एहसास शब्दों में बिंब के साथ उकेरे गए हैं। जितेंद्र गीत में शिक्षक की भूमिका में है। छात्रों को प्रकृति के साथ जीवन के दर्शन का साक्षात् अनुभव करा रहे हैं।  
 

चमका दो आज लालिमा अपने ललाट की...

कुदरत की इस पवित्रता को तुम निहार लो
इनके गुणों को अपने मन में तुम उतार लो
चमका दो आज लालिमा
चमका दो आज लालिमा अपने ललाट की
कण कण से झनकती तुम्हीं छबी विराट की
अपनी तो आँख एक है,  इसकी हज़ार है
ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार


भरत व्यास के इस गीत में हिंदी के शब्दों का उपयोग जिस ढंग से किया गया है वैसा आपको किसी अन्य गीत में नहीं मिलेगा। जितेंद्र के सरल चेहरे के मुख से हिंदी के शब्द मोतियों जैसे निकलते हैं। यह गीत महिमामंडन की बजाय एक  वंदना लगता है।
 

ध्वजा से ये खड़े हुए हैं वृक्ष देवदार के...

तपस्वियों सी हैं अटल ये पवर्तों कि चोटियाँ
ये बर्फ़ कि घुमरदार घेरदार घाटियाँ
ध्वजा से ये खड़े हुए
ध्वजा से ये खड़े हुए हैं वृक्ष देवदार के
गलीचे ये गुलाब के बगीचे ये बहार के
ये किस कवि की कल्पना
ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है
ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार


मुकेश की आवाज हिंदी के शब्दों को पिरोते हुए कर्ण में मदि्धम मदि्धम मिश्री घोलती है। गीत को सुनने के बाद लगता है जैसे संस्कार और सोंधे सोंधे से हो गए हैं तथा प्रकृति में बिखरते जा रहे हैं। गीत आपको संस्कृति और सभ्यता की ओर खींचता है।

7 वर्ष पहले
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