मनोज कुमार की फिल्में समाज और देश को कुछ ना कुछ संदेश देती हैं। कभी वह देश में आजादी और क्रांति की बात करते हैं तो कभी वह जीवन की रोजमर्रा की वस्तुओं का महत्व अपनी फिल्मों में बताते हैं। 1972 में रिलीज फिल्म शोर में उन्होंने पानी की अहमियत को समझाते हुए एक मधुर गाना बॉलीवुड को दिया।
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
जिसमें मिला दो लगे उस जैसा
आनंद हमें याद दिलाता है...
गर्मी और तपन के बीच जब आप धूप से आकर प्यास लगने पर ठंडा पानी पीते हैं तब जो आनंद आता है उसे शब्दों में बखान करना मुश्किल है। ऐसा आनंद हमें याद दिलाता है कि पानी बिना हमारा जीवन सूना है। सुबह उठने के बाद हमें सबसे पहले पानी चाहिए। अगर पानी नहीं होगा तो हमारी रसोई, देवी-देवता सारे धरे के धरे रह जाएंगे।
इस दुनिया में जीनेवाले ऐसे भी हैं जीते
रूखी-सुखी खाते हैं और ठंडा पानी पीते।
तेरे एक ही घूँट में मिलता जन्नत का आराम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
भूखे की भूख और प्यास जैसा।
ऐसे अहम जल का वर्णन करने वाला गीत पानी रे पानी तेरा रंग कैसा...मुझे बचपन से ही काफी पसंद है। बारिश की बूंदों के बीच इस गीत को फिल्माया गया है। इस गीत को सुनने के दौरान ऐसा लगता है कि कोई हमारी जन्मों की प्यास बुझा रहा है। गीतकार संतोष आनंद ने इसे लिखा है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की सुमधुर ध्वनि के बीच मुकेश-लता ने इसे गाया है।
गंगा से जब मिले तो बनता गंगाजल तू पावन
बादल से तू मिले तो रिमझिम बरसे सावन
सावन आया सावन आया रिमझिम बरसे पानी
आग ओढ़कर आग पहनकर, पिघली जाए जवानी
कहीं पे देखो छत टपकती, जीना हुआ हराम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
दुनिया बनाने वाले रब जैसा।
पर्यावारण दिवस पर हम जंगल, पेड़-पौधे, मिट्टी, जल, वायु को याद कर रहे हैं। जल को याद करने के लिए इस गीत से बेहतर और कोई दूसरा गीत नहीं हो सकता। पर्यावरण की हरियाली के लिए जल बहुत आवश्यक है। जल है तो कल है। जल की इसी महत्ता को विभिन्न पंक्तियों से इसमें जाहिर किया गया है। नायक मनोज कुमार कहते हैं पानी रे पानी तेरा रंग कैसा...तो नायिका जया बच्चन मनोज कुमार के सवाल का जवाब देकर कहती है...जिसमें मिला दो लगे उस जैसा...
वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए
जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ ना आए
कली खिले तो झट आ जाए पतझड़ का पैगाम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
सौ साल जीने की उम्मीदों जैसा।
नल की टपकती बूंदों के बाद रिमझिम बारिश में फिल्माए इस गीत में कोरस ने अपनी थिरकन बिखेरी है। करतल ध्वनि और मधुर संगीत के बीच जल को जीवन की उम्मीद के रूप में परोसा गया है। उसे गंगा जल, सावन, जन्नत का आराम, भूखे की भूख और प्यासे की प्यास बताया गया है। पानी का कोई रंग नहीं होता। जिस चीज में मिला दो वह उस रंग का हो जाता है। यह गुण तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो सबसे महान होता है। अहं को इसी ब्रह्मांड में विलय करके एकाकार होना कोई पानी से सीखे। इस तरह पानी पूर्ण आध्यात्मिकता के साथ हमारी जरूरतें पूरी करता है साथ ही यह हमारे मन को अपने तात्विक गुणों के साथ प्रक्षालित भी करता है। सच ही कहा है जल है तो कल है...
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
जिसमें मिला दो लगे उस जैसा...
आप भी इस गीत को यहां सुनिए-
8 वर्ष पहले