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क़ायनात में ईल्म वाले को नहीं बलिके सच्चे लोगों को नज़र आता है

WASI AHMAD QADRI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम वहां देखते हैं जहां इस दौर में शायद कोई कोई देखता होगा
        
                                                    
                            
किताबें पढ़ लेते हैं समझते कुछ लोग हैं समझता सभी लोग हैं
यकीन किसे कहते हैं मुफ़्ती और काज़ी पढ़ा होगा मग़र यकीं नहीं
आम आदमी क्या समझे इन बातों को जिसे बोलने का तरीक़ा नहीं
ईल्म वो अदब की किताब पढ़ने वाले तो मोबाइल में खो गया है
जो हर वक़्त खोया है मोबाइल में उसका दिमाग़ एक जगह होगा
मस्ज़िद में ऐसा कोई सफ़ नहीं जहां मोबाइल चमकता नज़र न आए
फ़रिश्ता,जिन्नात,आदमी और ख़ुदा सभी का खेल देख रहा है"वसी"
कुछ लोग हैं मस्जिद जाना छोड़ दिया है ख्यालें मुंतशिर होता है
क्यूं करे दुआ कबूल"अल्लाह"नमाज़ को तमाशा बना दिया है
मस्ज़िद की ईमाम अंजान नहीं नमाज़ी से ख़ुद में ईमान नहीं है
नमाज़ पढ़ने से जन्नत मिल जाती तो सच और झूठ अल्फ़ाज़ न होता
धर्म वजूद में नहीं आता गर नमाज़ी सच्चे वो चुगली से महफूज़ होते
हमारी आंखों में ईल्म की हैसियत नहीं बग़ैर अमल के ईल्म है मेरा
ईल्म लोगाें को ठगने केलिए नहीं सही रहा दिखाने के लिए होता है
जो लोग ईल्म का क़द्र दान है यक़ीनन दुनियां परास्त है इस दौर में
क़ायनात में ईल्म वाले को नहीं बलिके सच्चे लोगों को नज़र आता है
मखलूकात की दुनियां को समझने केलिए बहुत कुछ खोना पड़ता है

 
2 दिन पहले
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