हम भारत के वीर सपूत नहीं किसी से डरते हैं,
आ जाए जब आन की बात प्राण न्योछावर करते हैं,
रहते हैं हम शांत हवा सा, चले तो तुफान उठते हैं,
देख हमारे जज्बातों को बाग के फुल खिल उठते हैं,
आ जाए जब आन की बात प्राण न्योछावर करते हैं।
हम भारत के वीर सपूत नहीं किसी से डरते हैं।
खाते रहते सीने पे गोलियां फिर भी आगे बढ़ते हैं,
जब तक रहे खून रगो में भारत की जय बोलते हैं,
इस भारत को कहते माता, अमन यहां पर बसते हैं,
अलग- अलग के लोग यहां,अलग- अलग के धर्म,
भाषा बोलते अलग-अलग,लेकिन करते एक हीं कर्म,
त्याग देते सुख सारा बलिदान तिरंगे पे करते हैं,
आ जाए जब आन की बात प्राण न्योछावर करते हैं।
हम भारत के वीर सपूत नहीं किसी से डरते हैं।
जब आया समय तो दिखा दिया,
LOC में भी धूल चटा दिया,
फिर रहा गया न उनसे, किया छुप कर वार,
पहले किया सांसद पर, फिर दोहराया होटल ताज,
भारत के वीरों ने फिर चखाई उनको हार,
आयुध डाल चरणों में कीड़ों के भांति रेंगे थे,
भारत के वीर सपूतों को सलाम करते हैं,
आ जाए जब आन की बात प्राण न्योछावर करते हैं।
हम भारत के वीर सपूत नहीं किसी से डरते हैं।
।। विशाल दत्त चौबे ।।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।