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उम्मीदों का दौर

Vinita Tirpude

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज भी वही उम्मीद और नाकामयाबी के बहाने, सौ दफ़ा की गई ग़लतियाँ और फिर उन ग़लतियों को छुपाने के लिए बोले गए कई झूठ..
        
                                                    
                            
नाराज़गी उन चीज़ों पर, जिनमें कहीं न कहीं कोई खरोंच तो आई ही होगी। हर दफ़ा रूठना और अगले ही पल झट से मान जाना। लड़खड़ाते क़दम और काँपते हाथ, ख़ामोश जुबान और गुनहगारों-सा ख़ौफ़..
ताउम्र उन ग़लतियों की सज़ा, जो कभी की ही नहीं गईं, और वो ज़िम्मेदारियाँ, जिनमें कभी कोई समझदारी थी ही नहीं। हर रोज़ एक नई चमक-दमक और फिर अगले ही पल अपनी ही नज़रों में गिर जाना...
ये सब भी एक दौर है ज़िंदगी का। कभी आँसू तो कभी ख़ुशी की लहर, हर मोड़ पर एक नई महत्वाकांक्षा...
ये भी किसी शोर का हिस्सा ही है, जहाँ न तो शर्मिंदगी है और न ही किसी प्रकार का डर...

 
एक घंटा पहले
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