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कल की परछाई

Vineeta Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इतिहास के पन्नों पर
        
                                                    
                            
खुद को नहीं पाता हूँ।
क्या बीता कल ऐसा ही था
रिक्त मुझसे,
या वर्तमान की कल्पना है--
एक अधूरी कहानी?

ऐसा क्यों मुझको लगता है
मेरे होने से सम्राट भी है,
जो मैं न हुआ तो वो भी नहीं।
राजा हुआ यूं राजा
कि मैं प्रजा था।
मुझपर दया कर महान हुए,
मुझपर ही अत्याचार कर क्रूर।
महल, दीवारें, किले, मक़बरे
राजाओं ने जो बनवाए थे।
कड़ी धूप में खड़े हो मैंने
इन हाथों से बनाए थे।
विजयी हुआ जब राजा तब भी
अस्त्र-शस्त्र उस विजय के
मैंने ही बनाए थे।
विजय के जश्न में भूल गए सब
मैंने जो प्राण गंवाए थे।
कभी जुलाहा बन, कभी दासी, कभी सुनार
किया रानियों का रूप-श्रृंगार
पर सुनी जब कहानी,
उसमें थी बस एक सुंदर रानी।
सम्राटों के हाथी - घोड़ों के,
निर्जीव धनुष-तलवारों के भी
प्रसिद्ध नाम, और वर्णन हैं।

कहाँ हूँ मैं, ज्यों कभी था ही नहीं।
खुद को जब मैं कहीं नहीं पाता हूँ,
अपने इस अदृश्य से अस्तित्व से
बहुत विचलित हो जाता हूँ।

पर नहीं।
वर्तमान ने देखा नहीं
न राजा को, न रानी को।
मेरा अस्तित्व यहाँ अंकित है--
और क्या यह किसी उल्लेख से कम है?
इतिहास से अगर कुछ है जीवित
तो केवल मेरा श्रम है।

--विनीता शर्मा

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6 वर्ष पहले
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