हालात अपने दिल के बयान करने को कलम थामी थी मैंने,
पर उससे कहीं आगे निकल गया।
जो कुछ लिखा अपनी मोहब्बत के बारे में,
वो सारे ज़माने के आशिक़ों का हाल-ए-दिल निकल गया।
मैंने तो बस अपने इश्क़ की दास्ताँ लिखी थी,
हर लफ़्ज़ मगर किसी की तन्हाई का क़ातिल निकल गया।
सोचा था दर्द-ए-दिल को काग़ज़ पर रख दूँगा,
मगर हर अश्क किसी टूटे हुए दिल की मंज़िल निकल गया।
अपना समझकर जिसे मैंने हरफ़-ए-मोहब्बत में लिखा,
वो हर आशिक़ के लबों की एक ग़ज़ल निकल गया।