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वो बात कहाँ

Vijay Erry

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो बात कहाँ
        
                                                    
                            
मोबाइल में घड़ी आ गई,
हर पल समय बताती है,
पर दीवारों की वो घड़ी कहाँ,
जिसकी टिक-टिक घर को जगाती है.
हाथ में स्मार्टवॉच बंधी है,
हर सूचना पल में आ जाती है,
पर दादा की पुरानी घड़ी जैसी,
वो शान कहाँ, वो बात कहाँ.
गानों के ऑडियो हैं अब,
बस एक क्लिक में बज जाते हैं,
हजारों गीत मोबाइल में,
पल भर में मिल जाते हैं.
पर टेपरिकॉर्डर, वो डैक कहाँ,
कैसेट बदलने की वो बात कहाँ,
रीवाइंड करके गीत सुनने में,
जो अपना-सा एहसास था, वो बात कहाँ.
तस्वीरें अब बादल में रहती हैं,
क्लिक करो, हजारों मिल जाती हैं,
पर एलबम के पन्नों में छुपी,
वो यादें कहाँ लौटकर आती हैं.
फोटो स्टूडियो में घंटों बैठना,
फिर तस्वीर हाथ में पाना,
उस छोटी-सी खुशी के आगे,
आज की सेल्फी की बात कहाँ.
चिट्ठियां अब कोई लिखता नहीं,
संदेश तुरंत चले जाते हैं,
दो शब्द लिखकर दिल की बातें,
मोबाइल पर ही कह जाते हैं.
पर डाकिए की राह तकना,
लिफाफा छाती से लगाना,
कागज पर लिखे उन अक्षरों में,
वो अपनापन कहाँ, वो बात कहाँ.
रेडियो अब मोबाइल में है,
दुनिया जेब में समाई है,
पर आकाशवाणी की आवाज में,
जो सुबह-सुबह मिठास थी, कहाँ आई है.
पूरे परिवार का साथ बैठना,
एक ही आवाज को सुनना,
आज हजार चैनल हैं फिर भी,
वो सामूहिक आनंद की बात कहाँ.
अब किताबें स्क्रीन पर हैं,
एक क्लिक में पढ़ी जाती हैं,
पर पन्ने पलटने की खुशबू,
क्या स्क्रीन से कभी आती है.
पुरानी किताब में दबा हुआ,
फूल जब अचानक मिल जाता था,
बीता हुआ कोई मौसम जैसे,
फिर आंखों में खिल जाता था.
अब बच्चे खेलते मोबाइल पर,
मैदानों में सन्नाटा है,
गिल्ली-डंडा, कंचे, पतंगों का,
कहाँ गया वो जमाना है.
हार-जीत पर रूठना-मनाना,
मिलकर फिर मुस्काना,
आज ऑनलाइन खेल तो बहुत हैं,
पर दोस्तों वाली वो बात कहाँ.
चिट्ठी, रेडियो, टेपरिकॉर्डर,
घड़ी, कैमरा और किताब,
साधन छोटे थे उस युग के,
पर बड़ा था उनका ख्वाब.
आज सुविधा हर कदम पर है,
आज समय भी तेज हुआ,
पर सुविधा जितनी बढ़ती गई,
मन उतना ही अकेला हुआ.
हमने बहुत कुछ पा लिया,
पर कुछ पीछे छोड़ दिया,
तकनीक ने संसार बदल दिया,
पर बचपन वहीं मोड़ दिया.
सवाल मशीनों का नहीं है,
सवाल हमारे एहसास का है,
आज सब कुछ पास है फिर भी,
वो बात कहाँ, वो बात कहाँ.
शायद चीजें नहीं बदलीं केवल,
हम देखने वाले बदल गए,
सुविधाओं के इस मेले में,
हम अपने ही पल बदल गए.
जो बीत गया, उसे लौटाना
शायद संभव नहीं यहाँ,
पर यादों को दिल में जिंदा रखना,
क्या इतना भी मुश्किल है जहाँ.
इसलिए जब मोबाइल में घड़ी देखूं,
तो पुरानी घड़ी याद आए,
जब मोबाइल पर गीत सुनूं,
तो टेपरिकॉर्डर मुस्काए.
जब डिजिटल तस्वीर खुल जाए,
तो एलबम आंखों में उतर आए,
तब मन धीरे से पूछे खुद से—
इतना सब है आज हमारे पास,
फिर वो बात कहाँ...
वो बात कहाँ...

- विजय शर्मा ऐरी, अजनाला
4 घंटे पहले
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