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कविता- दरिद्र-नारायण

Vijai Pratap

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                            हमने देखा है—अपने बड़ों को
        
                                                    
                            
श्री रामायण जी की आरती करते हुए,
हमने सुना है—संतों, महात्माओं, विश्वगुरुओं को
वेदों-पुराणों की महिमा का बखान करते हुए,
हमने माना है—पुराणों, उपनिषदों में वर्णित
ज्ञान के अथाह सागर को,
क्योंकि हम वेदों, पुराणों और उपनिषदों को
पढ़ते नहीं, पूजते हैं।

क्योंकि
हम पहनाते रहे हैं कपड़े,
लगाते रहे हैं छप्पन भोग,
दिखाते रहे हैं धूप, दीप, गंध
स्वर्ण-खचित नारायण को
अपने ‘धनाधिकृत’ मंदिरों में,
इस बात से बेखबर
कि मैले-कुचैले कपड़ों में,
भूख भर भात को तरसते
कितने दरिद्र-नारायण
अनधिकृत, सीलनभरी
फुटपाथ की झुग्गियों में
अब भी विराजमान हैं—
किसी दयानिधान भक्त की चिर प्रतीक्षा में।
- विजय प्रताप
 
2 महीने पहले
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