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करती क्रीड़ा प्रकृति अनंत

Vandana Agrawal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करती क्रीड़ा प्रकृति अनंत
        
                                                    
                            
दृश्य कभी भयावह कभी संत।
सूखे पतझड़ की प्यास में ठहरा
अमरता का बासंती रंग गहरा।

दृगों में उठते जितने प्रश्न
है अमोल निधि मेरे स्नेह रत्न।
साधनामय त्याग का मंदिर
जलती प्रीत जोत जिसमें कंदील।

छोड़ चले जो पद राह
चूमते चिन्ह उनके अश्रु आह।
निष्प्रभ दिशाओं की धूली से सिंचित
हृदय स्पंदन नहीं पुनीत प्रेम से वंचित।

स्वप्नों पर डाले किसने बादल
किया तांडव महानिद्रा का आकर।
बरसी बरखा जो आंसुओं में डूब
हुए दुःख पथ भी अब दुख से शून्य।
- वंदना अग्रवाल 'निराली'
एक वर्ष पहले
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