कोई तो इशारा कर दो
हे नटवर नागर कृष्ण कन्हाई।
बितती तेरी यादों में अब तो
बैरी बावली व्यथित तन्हाई।
सजल नयनों का देकर वरदान
हुए कहां स्वामी तुम अंतर्ध्यान?
खोजती विवश बेचैन प्रीति
अंत आरंभ में निहित तेरी कृति।
बुलाते तुम्हें सजीले स्वर शांत
ललित लोचन स्पंदन क्लांत।
ज्वलंत वेदना के कंठगत रुदन
मौन स्मित के अश्रुकण हे मधुसूदन।
-वंदना अग्रवाल 'निराली'