विज्ञापन

अभिमानी मिथ्या

Vandana Agrawal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्लांत कमली करुण नयन
        
                                                    
                            
बहती पीड़ा उर्मिल मन,
मौन में जीत व्यथा तृण
हँसता विकल चितवन मृग।

स्निग्ध छाया बुलाती आ
विस्मृति से उसे जगाती आ,
रंगा हृदय परिचित रंगों से
स्पर्श नहीं वह प्राण अंगों से।

उर- उर बसी स्पंदन स्मृति
प्रेम में विरह की कैसी रीति?
उड़ चले अनंत सांझ के पंक्षी
जागते देखते तुझे दृग पंथी।

मिलो मिलन के मंदिर तुम
सलिल कणों सी हो गई गुम,
अनुरागी, अभिमानी मिथ्या
झूमती, गाती बावरी नृत्या।
-वंदना अग्रवाल "निराली"
 
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

444 कविताएं

View Profile