आज मैं रुक्मिणी को लिखती हूँ।
सब राधे राधे लिखते हैं।
आज मैं रुक्मिणी को लिखती हूँ।।
पत्नी वो कृष्ण की थी,
रूप और गुणों की ज्ञानी,
अवतार वो महालक्ष्मी का थी
वो धन्य महारानी।
सौभाग्यवान वो नारी
जो स्वयं नारायण की अर्धांगिनी।
एक पत्र लिखा रुक्मिणी ने
कृष्ण ने स्वीकार किया।
लोग कहते है रुक्मिणी का हरण किया,
पर वो हरण नहीं श्री ओर हरि का मिलन था।
रुक्मिणी की कहानी राधा जी से अलग थी
पत्नी वो नारायण की थी
पर जिक्र राधा कृष्ण का हैं।
क्या कभी पूछा नहीं रुक्मिणी ने
क्यों हरिप्रिया मैं नहीं?
पर वह स्वयं सृष्टि के रचयिता को जानती थी,
और राधा का अलौकिक प्रेम पहचानती थी।
वह नारायणप्रिया जगत जननी,
नारायण की लीलाओं को जानती थी।
दोनों ही महामाया दोनों एक ही महाशक्ति
राधा रानी कृष्ण का ही स्त्री स्वरूप थी
और रुक्मिणी महालक्ष्मी,
फिर भी सब कहते है एक प्रेयसी और एक पत्नी थी।।
-रुचिका सिरोठा