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                            मौत की कोई न धर्म न जाति
        
                                                    
                            
उजड़ता है जब एक घर पीड़ा शेष रहती
अगर फैसला सड़क पर होगा
तो न्यायालय किस लिए
वर्षों से यह सिलसिला जारी
कम लोगों ने प्रश्न किया
आज क्यों शोर अधिक
जब अपनों की बारी आई
मानवता का दर्द एक हो
यही समाज की पहचान हो
एक मौत पर ताली एक पर मातम
यह कैसा दोहरा मापदंड
जाति नहीं इंसान देखो
दर्द नहीं बदलता,जाति बदलने से
3 महीने पहले
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Shivam Awasthi

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