विज्ञापन

एनकाउंटर

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौत की कोई न धर्म न जाति
        
                                                    
                            
उजड़ता है जब एक घर पीड़ा शेष रहती
अगर फैसला सड़क पर होगा
तो न्यायालय किस लिए
वर्षों से यह सिलसिला जारी
कम लोगों ने प्रश्न किया
आज क्यों शोर अधिक
जब अपनों की बारी आई
मानवता का दर्द एक हो
यही समाज की पहचान हो
एक मौत पर ताली एक पर मातम
यह कैसा दोहरा मापदंड
जाति नहीं इंसान देखो
दर्द नहीं बदलता,जाति बदलने से
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Deepak Sharma

24 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12492 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10362 कविताएं

View Profile