"पत्नी पीड़ित इंसान का दर्द "
पत्नी पीड़ित इंसान न कभी अपना दुखड़ा कह सकता,
रोज सुबह सबेरे पत्नी के ताने सुन चुपके-चुपके रो सकता।
न कभी कोई आंसू देखे इसलिए शेखी बघारना है मजबूरी,
वरना रोटी न मिले घर में घोड़े के आगे चलना है जरुरी।।
गधा बनकर बोझा उठाए और खच्चर बन कराए सवारी,
पति बेचारे को पत्नी के आगे कोल्हू का बैल बनना है मजबूरी।
जिस साड़ी पर हाथ रखा वो घर में लानी है फिर जरुरी,
वरना कोहराम मचे घर में ऐसा मैदान छोड़ना फिर मजबूरी।।
बिल्ली के आगे चूहा नाचता मंदारी के आगे नाचे बंदर,
शेर के दिल से पूछना जरा घरवाली के पीछे सब सिकंदर।
बड़े बड़े सूरमा इससे घबराते इसके आंसू कहर बन जाते,
राज-पाट तक इसके आगे नतमस्तक सबसे बड़ी यही सिकंदर।।
घर में रोटी खानी है तो रोज सबेरे हाथ जोड़ नमस्ते
करना,
अपना दुखड़ा भूल कभी किसी कवि से तो मत ही कहना।
बड़ी शरीफ़ कौम है कवि और बीवी की दोनों की है इक सी जोड़ी,
एक घर में रहकर खूब रुलाये दूजा कविता बना सबको हंसाए।।
खुद शायर होकर घोड़े के आगे चलते पीछे पत्नी खिल्ली उडाए,
दर्द बड़ा है भारी इतना आज मानव शादी कर खूब पछताए।
शहंशाह घोड़े पर बैठ आदेश चलाए नौकरी घोड़े के आगे आगे जाये,
यही हाल हर पति का दुनिया में शादी कर फिर जीवन भर पछताए।।