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मुझसे मिलाता सफ़र

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इम्तिहान बहुत थे,
        
                                                    
                            
मगर रास्ते कई मिले मुझे।

चलना भी नहीं था,
रुकना भी नहीं था—
मगर चलना ज़रूरी था।

शायद रुकती,
तो कहीं सोच में खो जाती,
शायद ठहरती,
तो ख़ुद से ही दूर हो जाती।

इसलिए चलती रही राहों पर,
चलती रही मंज़िल की ओर—
क्योंकि डर था,
अगर कहीं रुक गई,
तो मंज़िल बहुत दूर
कहीं खो जाएगी।

इसलिए थकी ज़रूर,
मगर रुकी नहीं—
क्योंकि मुझे मालूम था,
मंज़िल उन्हीं को मिलती है
जो रास्तों से हारकर
रास्ता बदलते नहीं।

साक्षी यादव _
2 महीने पहले
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