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मानवता बस हार रही है

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                            मानवता बस हार रही है
        
                                                    
                            

रूस–यूक्रेन की धरती पर,
कितने घर वीरान हुए,
कल तक जिनमें जीवन हँसता,
आज वही श्मशान हुए।
इज़राइल–ईरान के भय से,
खाड़ी तक बेचैनी छाई,
शक्ति दिखाने की हठ ने फिर,
विश्व-शान्ति दाँव लगाई।
सीमा जीते या सत्ता जीते,
ज़िंदगी हर दिन हार रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

एक सैनिक सीमा पर सोया,
एक पिता घर लौट न पाया,
राह निहारती एक पत्नी ने,
अपना पूरा संसार गँवाया।
एक माँ ने चौखट पर अब भी,
आशा-दीप जलाया है,
जिस बेटे की देह न लौटी,
उसका चित्र सजाया है।
हर चिता के साथ यह धरती,
थोड़ा जीवन हार रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

टूटी छत के नीचे बच्चा,
ढूँढ़ रहा पुस्तक, खिलौना,
जिस आयु में सपने बुनता,
सीखा उसने अपनों को खोना।
बस्ते छूटे, स्कूल जले हैं,
बचपन शरणार्थी कहलाया,
आँख खुली तो धुआँ मिला है,
आँख लगी तो डर का साया।
मलबे में दबकर हर आशा,
धीरे-धीरे मर रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

एक सुहाग की चूड़ी टूटी,
एक बहन की राखी छूटी,
एक पिता की आँखें सूनीं,
एक घर की खुशहाली रूठी।
जिसको शत्रु बताकर मारा,
वह भी किसी का अपना था,
उसकी आँखों में भी घर था,
उसका भी कोई सपना था।
अपनों की तस्वीर उठाए,
आँख निरन्तर झर रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

अनाज महँगा, ईंधन महँगा,
रोटी तक लाचार हुई,
युद्ध कहीं सीमाओं पर था,
पीड़ा घर-घर पार हुई।
समुद्री राहें ठहरीं तो,
व्यापारों की चाल गिरी,
महँगाई की मार पड़ी तो,
निर्धन की फिर थाल गिरी।
दूर कहीं बारूद जला है,
हर जेब कीमत भर रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

कारख़ाने चुप, श्रमिक खाली,
रोज़गार पर संकट छाया,
मुद्रा टूटी, पूँजी सहमी,
हर उद्योग ने मूल्य चुकाया।
खेती महँगी, दवा भी महँगी,
जीना कितना कठिन हुआ है,
रक्षा-खर्च बढ़ा देशों का,
जन-कल्याण सीमित हुआ है।
युद्ध कहीं भी होता लेकिन,
कीमत दुनिया भर रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

अस्पताल मलबे में बदले,
घायल जीवन रोते हैं,
दवा पहुँचने से पहले ही,
कितने प्राणों को खोते हैं।
विद्यालय वीरान पड़े हैं,
खेतों में बारूद बिछा है,
जिस धरती पर अन्न उगता था,
मृत्यु का सामान रखा है।
रोटी, शिक्षा और दवा भी,
अपना हक़ पुकार रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

कल तक जो पड़ोसी घर थे,
आज वहीं दीवार खड़ी,
एक नदी के दोनों तट पर,
सन्देहों की धार बढ़ी।
हाथ मिले पर मन न मिलते,
मुख पर शान्ति, भीतर डर,
शीतयुद्ध की मौन अग्नि में,
धीरे-धीरे जलता हर घर।
मन से मन की बढ़ती दूरी,
हर निकटता मार रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

हथियारों के सौदागर ने,
लाभ का अंक बढ़ाया है,
धरती के अन्तिम लेखे में,
केवल घाटा आया है।
आज किसी का नगर जला है,
कल उसका भी द्वार जलेगा,
आग बेचकर लाभ कमाया,
अन्त में उसका घर जलेगा।
कुछ की तिजोरी भरती जाती,
धरती कीमत भर रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

मेज़ों पर नक्शे बँटते हैं,
धरती टुकड़ों में बँट जाती,
कुछ पल के निर्णय से पूरी,
पीढ़ी जीवन भर पछताती।
राजमहल सुरक्षित रहते,
निर्धन का संसार उजड़ता,
सत्ता अपना रंग बचाती,
जनता का हर रंग बिखरता।
सिंहासन इतिहास लिख रहे,
जनता पीड़ा सह रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

कौन विजेता कहलाएगा,
जिसके हाथ लहू से भारी?
किस गौरव का गीत लिखेगी,
घर से बेघर हुई बेचारी?
युद्ध समाप्ति की घोषणा से,
क्या सब कुछ फिर मिल पाएगा?
बेटा, पिता, सुहाग, खिलौने—
कौन इन्हें लौटा पाएगा?
ध्वज भले ऊँचा लहराए,
हर आँख फिर भी झर रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

आओ, शस्त्र रोककर फिर से,
मन से मन का सेतु बनाएँ,
जितना धन बारूदों पर है,
उतना जीवन पर लगाएँ।
भूखे को भरपेट मिले फिर,
बच्चों को विद्यालय मिले,
सीमाओं के दोनों ओर भी,
मानव को मानवता मिले।
जीत वही जब जीवन जीते,
शान्ति यही पुकार रही है।
न कोई जीता, न कोई हारा,
मानवता बस हार रही है।

-संतोष कुमार शर्मा
16 घंटे पहले
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