काठियावाड़ के गलियों में,
आई एक नई जवानी थी,
राष्ट्रपिता कहलाए जो,
उनकी ये अमर कहानी थी।
ब्रिटिश करते थे राज यहाँ,
बढ़ती भारत में महँगाई थी,
अत्याचार जब बढ़ा भारत में,
तो बापू ने सत्याग्रह की आवाज उठाई थी।
सन् 16, 17, 18 में सत्याग्रह की,
आग जलाई थी,
गुजरात, अहमदाबाद, बिहार को,
ब्रिटिश नीति से आजादी दिलाई थी।
पारित हुआ जब रॉलेक्ट एक्ट,
तो इसने हिंसा की दीप जलाई थी,
बैठे बापू अनशन पर तो,
इस एक्ट की आवाज दबाई थी।
हुआ नरसंहार जलिया बाग में,
बेकसूरों ने गोलियाँ खाई थी,
मार्शल लॉ लागू करके,
जनरल डॉयर ने गोलियाँ चलवाई थी।
मारे गए सैकड़ों लोग,
जिनकी ना कोई कहानी थी,
टैगोर ने लौटाई उपाधि,
उनकी ये सच्ची कुर्बानी थी।
सत्याग्रह की खोज कर,
लाई एक नई कहानी थी,
राष्ट्रपिता कहलाए जो,
उनकी ये अमर कहानी थी।
ना रुका जब ब्रिटिशों का अत्याचार,
तो बापू ने सभा बुलाई थी,
किया एक हिन्दू-मुस्लिम को,
और खिलाफत की नींव रखवाई थी।
बहिष्कार किए विदेशी कपड़े,
स्वदेशी की शान बढ़ाई थी,
एक जुट किया पूरे भारत को,
और असहयोग आंदोलन की ताकत दिखलाई थी।
गोरखपुर में घटे चौरी-चौरा ने,
एक तीथी यादगार बनाई थी,
हुए घायल अनेकों जवान,
तो इस आंदोलन की आवाज दबाई थी।
फिर भी ना रुके कदम,
बापू ने ऐसी राह बनाई थी,
आजाद कराना भारत को,
बापू के जीवन की सच्चाई थी।
साबरमती के आश्रम से,
उन्होंने फिर आवाज उठाई थी,
तोड़ा गया नमक कानून,
सविनय अवज्ञा की ऐसी लौ सुलगाई थी।
अहिंसा के मार्ग पर चलके,
देश में एकता लाई थी,
भारत को आजाद कराने में,
बापू ने अपनी पूरी जिन्दगानी लगाई थी।
तैयार किया भारत का ध्वज,
बापू ने आजादी की झलक दिखलाई थी,
होगा स्वतन्त्र राष्ट्र हमारा,
ये गूँज पूरे भारत से आई थी।
फिर भी ना रुका अत्याचार,
ब्रिटिशों ने ऐसी कानून व्यवस्था बनाई थी,
किया गिरफ्तार जब बापू को,
तो पूरे भारत में मची तबाही थी।
फिर भी ना टूटे बापू के इरादे,
सत्याग्रह की ऐसी उमंग जलाई थी,
बढ़ा अत्याचार जब ब्रिटिशों का,
तब बापू ने अंतिम भारत छोड़ो की आवाज उठाई थी।
दिया मंत्र करो या मरो,
क्योंकि ये आखिरी लड़ाई थी,
पूर्ण स्वतन्त्रता का मन्त्र लेकर,
पूरे भारतवासी ने ब्रिटिशों की नींव हिलाई थी।
स्वतन्त्र हुआ पूरा भारत,
पूरे विश्व से एक ही गूँज आई थी,
सन् 1947 के सन ने पूरे इतिहास,
में अपनी जगह बनाई थी।
ऐसा था बापू का प्रण,
जो हर एक दिल को भाई थी,
छोड़ चले बापू सबको,
पर उनके वचनों ने आज भी लोगों के दिल में जगह बनाई थी।
काठियावाड़ की गलियों में,
आई एक नई जवानी थी,
राष्ट्रपिता कहलाए जो,
उनकी ये अमर कहानी थी।