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आखिर मानव क्या चाहता है !

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            स्वतंत्रता का गीत गाए पर, खुद से खुद स्वतंत्र नहीं,
        
                                                    
                            
स्वार्थ,लोभ,मोह और निंदा, मन है इनसे परतंत्र अभी,
होठों पर मानवता है पर, दिल में है भेदभाव अभी,
झूठ का साम्राज्य बड़ा है और सत्य अंगीकार नहीं,
खुद के बड़े उपकार मानकर, वह अपने ही गुण गाता है,
मेरे समझ नहीं आता, आखिर मानव क्या चाहता है !

हो गया मूल्यों का पतन, समाज ने नया मुखौटा पहना है,
मानवता की प्रीत भुलाकर, लोभ-लालच का चोला पहना है,
नाते- रिश्ते और मित्रता, स्वार्थ के बल पर निभते हैं,
भावनाओं का कोई मोल नहीं, ना प्रेम प्रीत कोई रखते हैं,
बड़ी-बड़ी पंचायत करता, खुद को सामाजिक प्राणी बतलाता है,
मेरे समझ नहीं आता, आखिर मानव क्या चाहता है !

नारी को देवी कहता है, पर उसको मान न देता है,
अत्याचार और शोषण की, जंजीर में घेरे रहता है,
बाहर निकलने में नारी को, आज भी संदेह होता है,
सुनकर पीड़ित बेटियों का दुख, उसका भी मन रोता है,
वैसे बेटी को लक्ष्मी कहता पर, उसके जन्म पर दुख मनाता है,
मेरे समझ नहीं आता, आखिर मानव क्या चाहता है !

शहर रोशनी से जगमग करते पर, कहीं घरों के चूल्हों में आग नहीं,
कहीं बनी है बड़ी इमारतें, पर कहीं सोने को छत पर तिरपाल नहीं,
कहीं बड़े-बड़े शोरूम बने है, कहीं बड़े से मॉल बने हैं,
नन्हे मासूम का तन ढकने को, पर गरीबी से हाथ बंधे हैं,
समानता की बड़ी बातें करता, खुद को आदर्श दिखलाता है,
मेरे समझ नहीं आता, आखिर मानव क्या चाहता है !

कटते पेड़, होते खनन का, दुख भी धरती मां सहती है,
फिर भी अपनी संतान समझकर, मानव को सबकुछ देती है,
होते नष्ट गिरि, कानन, नदियों की, मौन पीड़ा वो सहती है,
वन्य जीवों के शिकार पर स्वयं के आंसू वो पीती है,
करके घाव सीने में वसुधा के, उसको माता बतलाता है,
मेरे समझ नहीं आता, आखिर मानव क्या चाहता है !

जाति धर्म से ऊपर उठने की, सोच बड़ी वह रखता है,
पर इंसानियत बांटने को, धर्म की दीवार खड़ी वह करता है,
विडंबना देखो रिश्तो में, पहले जाति पूछी जाती है,
आदर्शों की चिता जलाकर, सांप्रदायिकता पूजी जाती है,
'वसुदेव कुटुंबकम' कहके, वह अपना मान बचाता है,
मेरे समझ नहीं आता, आखिर मानव क्या चाहता है !
~ राजेश कुमार वर्मा
एक घंटा पहले
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