इक उलझन दिखती है मुझको आँखों की बीनाई में,
जब से छोड़ गई है महफ़िल मुझको इस तन्हाई में।
ख़ुशियों ने मेरी ख़ातिर क्यों सारे रस्ते बंद किए,
इक रस्ता दिखता है मुझको दर्द की हर अँगड़ाई में।
घर पर धूम मची थी उसकी, खूब सजा घर-आँगन था,
दर्द मिले हैं मुझको कितने एक मधुर शहनाई में।
किस रस्ते से गुज़रें अब हम, किस जानिब जाएँ बोलो,
दर्द का परबत आज है ऊँचा, ख़्वाब पड़े हैं खाई में।
सब की नज़रों से ओझल, इल्ज़ाम मिले मुझको लेकिन,
क्यों रुसवाई ढूँढ रहा है जग मेरी अच्छाई में?
लोग कहें अपने साए पर मत करना ऐतबार कभी,
हरदम आँख पे पट्टी मिलती क्यों मुझको दानाई में?
एक दीवानापन है भीतर, बाहर इक वीरानी है,
'अब्र' मिले हैं दर्द भी कितने मुझको इक परछाई में।
-अब्र लखनवी