तैरने के हुनर पर शेखी बघारती रही।
घर-गृहस्थी में तिल-तिल डूबती रही।।
कुछ ज़मीर बचाकर रखा बेकार गया।
तर्क-वितर्क करके पंख समेटती रही।।
सारे दोस्त एक एक कर दूर होते गए।
अकेली बची खुद माथा पीटती रही।।
चुप रहने पर पत्थर उछाले गए मुझपर।
भविष्य की सोच जिम्मा घसीटती रही।।
कागज की कश्ती पार लगा ना सकीं।
हाथ पैर मारे 'उपदेश' गोते खाती रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'