वाणी अब मूक पड़ी है।
साँसों में संवाद रमा है।।
कुसुम कणों से पूछ रही।
बुझे दीप में कहाँ शमा है।।
तू दूर चला जग शून्य हुआ।
बिन तेरे दिल कहाँ रमा है।।
मन तेरे चरणों में धर दूँ।
वेग पवन का कहाँ थमा है।।
ओ प्रियतम लौट के आजा।
नयनो में 'उपदेश' जमा है।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'