वजन सह न सके और फिर झूल गए।
मोहब्बत में हाथ लगाया फिर फूल गए।।
उसी शख्स को पीठ के पीछे से पकड़ा।
बेसब्री में अपना समझ कर झूल गए।।
उसी प्रक्रिया ने बीमार कर दिया मुझे।
सब कुछ जानते हुए भी मेरे उसूल गए।।
शिकारी का शिकार बनकर मौज लिया।
नियम जानते हुए सब कुछ कुबूल गए।।
जिन्दगी में निशानियाँ छोड़ कर आए।
उन्हीं निशानियाँ को 'उपदेश' भूल गए।।
इस तरह का नसीब किसी किसी का।
उम्र की हद को मात देकर सब झेल गए।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'