बचपन से आज तक बहुतों से टकराई हूँ।
मेरे हक की लिखी ठोकरे खाकर आई हूँ।।
दुख दर्द जैसे सारे के सारे नसीब से जुड़े।
कठिनाईयों की बारिश में भींग कर आई हूँ।।
मेरे बर्दास्त की हद का अंदाजा न लगाओ।
दिल जली हूँ कईयों को जला कर आई हूँ।।
थोड़ी राहत तुम्हारी छांव में महसूस कर।
ठंडक महसूस कर सुकून की पनाह पाई हूँ।।
बेबुनियाद वादों से नफरत हो गई 'उपदेश'।
बहुत दिनों के बाद तुम्हें पाकर मुस्कराई हूँ।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'