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जाने क्या ढूँढती फिर कहती मिल गया।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुझे आजतक याद है शरारतें उनकी।
        
                                                    
                            
वक्त की लकीर से जुड़ी इबारतें उनकी।।

कहने की बात नही फिर भी कह देता।
हर रविवार को उड़ते रहे दावतें उनकी।।

तलाश खत्म हुई उनके मिलने के बाद।
वक्त लेकर खुल गई दबी चाहतें उनकी।।

जाने क्या ढूँढती फिर कहती मिल गया।
घंटों देखता रहा 'उपदेश' इबादतें उनकी।।

न चाहते हुए भी पूछ लिया कैसा लगा।
कब की भारी रुकती नही बातेँ उनकी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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