गंगा के तट पे वो मुझे मिलने बुला रहे
ह्रदय की शुष्क अवनि पे प्रणय खिला रहे
मन के भुवन में घोर तिमिर रात छाई थी
वो हर दिशा में प्रेम के दीपक जला रहे
— त्रिशिका धरा