ये दिल उक्ता चुका है अब जहाँ से
कहीं हम हाथ धो बैठें न जाँ से
हमारे ख़ौफ़ की हद बढ़ रही है
बहुत नज़दीक है आतिश-फ़िशाँ से
ज़मीं भी दूर होती जा रही है
हमें डर लग रहा है आसमाँ से
ख़रीदारों से ये कैसे कहूँ मैं
मुझे नुक़्सान होता है दुकाँ से
निगाहें बेच दी हैं मैं ने 'तस्लीम'
तुम्हें देखूँगा अब जाने कहाँ से