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“उरी” का मंज़र, कुछ कर दिखाना है

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उरी का मंज़र झकझोंर दिया है मानस को
        
                                                    
                            
अश्रुपुरित आंखें हैं, सुलगते सीने हैं अैार उफ़नता ज्वालामुखी

याद अाता है, जब वो मंज़र
कलेजा काँप उठता है अपना
बदन तमतमा जाता है
ख़ून उबल आता है
प्रतिकार की भावना, स्वत: प्रबल हो जाती है

क्षमा ,करूणा ,दोस्ती ,सहिष्णुता का पाठ बहुत पढ़ाया
पर नर व्याघ्र ,क्या तुम्हें समझ में आया?
मौक़े दिये अनेक
दोस्ती का हाथ बढ़ाने को
पर तूने तो सदैव पीठ में
ख़ंजर ही भोंका
कभी उपेक्षा, कभी अाकृमण से
कभी कायरता, कभी सर्पदंशी शब्द से

पर आई है बारी अपनी ,प्रतिशोध की, शांति सहिष्णुता के अवरोध की
विष जो समग्र शरीर में समाया है
उसे अमृत बनाना है
दबा हुआ आवेश
उबल कर फूट पड़ा है
सब् का बाँध अब टूट चुका है,अब उद्धार की बेला है
विवश नहीं हम, न्याय का खड्ग उठाना है
अब कुछ कर दिखाना है, अब कुछ कर दिखाना है…….


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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