काँच की चूड़ियों की खनक,,,
साथ में रहो के,
काँच की चूड़ियों की
खनक होती रहे।
पास में बैठो के
मुहब्बत की
महक मिलती रहे।
काँच की चूड़ियों की
खनक में,
दिल की धड़कन
बस यूं ही बहकती रहे।
हाथ पे तुम हाथ रखो,
के कलम लिखती रहे।
ज़िंदगी के साज़ पर
नज़्म सी सजती रहो
ऑ चूड़ियों की खनक आती रहे।
रूह के दयार में
तुम बयार सी संग
रहो,
के चूड़ियों की खनक
की तरन्नुम आती
रहे।
आरती हो के
सजदा,
उसकी चौखट पे
सदा,
चूड़ियों की खनक से आती रहे।
तुम हो या के कुदरत
बस तुम्हारी ख़ुश मिज़ाज़ी,
बस दस्त ए खनक से
आती रहे।
और तो और
बस ख़्वाब यही
मेरे मुल्क की आधीआबादी से
ख़ुशी ए खनक आती रहे।
यूं तो अब दौर ए
नुमाईश है,
पर सदा दौर ए परवरिश
की आती रहे।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा