प्रियकर लगता है बहुत, स्मृतियों का संसार।
इसका हो सकता नहीं, कहीं आर या पार।
कहीं आर या पार, मधुर यादें जब आती।
पिया मिलन की चाह, निरंतर बढ़ती जाती।
कहते वैद्य सुरेन्द्र, सुखद अनुभूति लिए स्वर।
बिखराते मुस्कान, मधुर अधरों पर प्रियकर।
-सुरेन्द्रपाल वैद्य