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रणभेरी

surangma yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पल में क्या से क्या हो गया समझ नहीं ये कुछ आया
        
                                                    
                            
खुशी रूदन में बदल गयी थी,खूनी मंजर था छाया
अभी सजा सिंदूर माँग में, मेंहदी का रंग गहराया
खुशियाँ सारी ढेर कर गया क्षण में आतंकी साया
कायरता भी शर्मसार है ऐसा कत्लेआम किया।
सिंदूरी सपनों को पल में,अर्थी पर है सुला दिया
माँ का सूना आँचल कहता,लाल कहाँ तुम चले गये
वापस लौटे नहीं दुबारा कितनी दूर निकल गये
नाम धर्म का लेकर अपने धर्म को वे लजवाते हैं
खाने के लाले घर में खैरातों पे इतराते हैं
धर्म नहीं है उनको प्यारा,उनको हिंसा प्यारी है।
अपनी कौमों के माथे पर लिखते वे गद्दारी हैं
दहशतगर्दी फैलाना ही धर्म जिन्होंने माना है
इंसानी जानों की कीमत अब उनको समझाना है।
शृंगालों ने खुद ही आकर शेरों को ललकारा है
उनको दण्डित करना ही अब पहला धर्म हमारा है
प्रेम- अहिंसा धर्म हमारा,तब तक हमें सुहाता है
शत्रु हमारी ओर ना जब तक अपनी आँख उठाता है
दुष्ट दलन के लिए कृष्ण को चक्र चलाना पड़ता है
मर्यादा पुरुषोत्तम को भी धनुष उठाना पड़ता है
जिसके लिए शांति की भाषा अब तक समझ नहीं आयी
उसे शस्त्र की भाषा समझाने की अब बेला आयी
जिसे ‘सीजफायर’ में भी बस ‘फायर’ याद ही रहता है
उसके इरादे ‘सीज़’ करें हम बच्चा- बच्चा कहता है।
धोखे का ही रक्त रगो में जिसकी बहता रहता है
उसकी क्रूर कुचालों की इतिहास गवाही देता है
सेना की रणभेरी ने अब ऐसा राग सुनाया है
दहशत फैलाने वाला दिल,खुद दहशत में आया है
केवल ये ‘सिंदूर’* नहीं है,शिव का नेत्र तीसरा है
वे भी बचा नहीं पायेंगे,जिनका तुम्हें आसरा है
- सुरंगमा यादव
 
एक वर्ष पहले
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