मुझसे मेरी मोहब्ब्त ही धोखे करती है,
कुछ बोलती है तो कुछ करती है।
वो अंजान है कि हमे खबर नहीं उनकी,
हमे सब मालूम है वो किससे वास्ता रखती है।
मुझसे मेरी मोहब्ब्त ही धोखे करती है,
कुछ बोलती है ......
मेरी आंखों से अपनी पहचान छुपाती है,
हंसकर हमारे सारे सपने तोड़ती है।
मजबूर हूं कि दिल ने उन्हें चाहा है,
तभी तो हमारी मोहब्ब्त उनकी नादानियां माफ करती है।।
मुझसे मेरी मोहब्ब्त ही धोखे करती है,
कुछ बोलती है तो कुछ करती है।
लेखक - सुनित हरीश कटियार
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