शोर लहरों का किनारों तक रहा,
गहराइयों में एक सुकून बहता रहा।
पत्थर तराशे गए हर बहाव में,
दरिया मगर खामोशी से सब सहता रहा।
ना शिकायत हवा से, ना धूप से गिला,
जो भी मिला सफर में, सबक सा मिला।
मंजिल तो समंदर ही थी मुकद्दर में,
रास्ते का हर मोड़ नया रंग खिला।
पहाड़ों का सीना चीर कर जो रास्ता बनाया,
उसने अपनी प्यास का कभी किस्सा ना सुनाया।
गिरते हुए झरनों का वो दर्द जानता था,
मगर खुद को उसने समेटना ही सिखाया।
कितने मौसम आए, कितनी रुतें ढलीं,
तन्हाइयों की हर एक बूंद साथ चली।
दुनिया ने देखा सिर्फ पानी का बहाव,
किसको खबर थी अंदर क्या आग जली।
नावों का बोझ भी हंस कर उठाया उसने,
डूबने वालों को भी किनारा दिखाया उसने।
अपने किनारों को भले खो दिया हो कभी,
पर प्यासों का दामन हमेशा सजाया उसने।
शोर मचाना तो उथले पानी की आदत है,
गहराइयों की तो खामोशी ही इबादत है।
जो बहता रहा बिना रुके, बिना थके सदा,
उस दरिया के सब्र में ही छिपी कायनात की ताकत है।
अंत में जब जा मिला वो असीम समंदर में,
कोई लहर ना उठी उसके इस सिकंदर में।
खामोशी से शुरू हुआ था जो सफर उसका,
वो मुकम्मल हुआ जाके एक अमर मंजर में।