विज्ञापन

डिजिटल हमदर्द

Suman Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सड़क पर कोई गिरा पड़ा था, भीड़ वहां भी भारी थी,
        
                                                    
                            
मदद को हाथ नहीं बढ़े, पर वीडियो बनाने की तैयारी थी।
खून बह रहा था सड़क पर, लोग 'लाइव' जा रहे थे,
इंसानियत मर रही थी, और लोग 'व्यूज' कमा रहे थे।
कैमरे का लेंस अब, संवेदनाओं से बड़ा हो गया,
मददगार पीछे रह गया, 'क्रिएटर' आगे खड़ा हो गया।
किसी की चीख में भी अब, 'कंटेंट' ढूंढा जाता है,
दर्द को भी लाइक और शेयर के तराजू में तोला जाता है।
घर में बूढ़े बाप से, दो बातें नहीं होतीं,
पर फेसबुक की वॉल पर, शोक की नदियां नहीं सोतीं।
जिंदा रहते वक्त जिन्हें, पानी का गिलास न दिया,
मरने के बाद उनके लिए, 'RIP' का स्टेटस जिया।
गरीब को रोटी देते वक्त, सौ सेल्फी खिंचवाते हैं,
एक निवाले के बदले, उसकी गैरत (Self-respect) खा जाते हैं।
दान में दी गई चादर भी, अब फोटो बिना नहीं चढ़ती,
मदद की नीयत कम, अपनी ब्रांडिंग ज्यादा बढ़ती।
रिश्तों की ऊष्मा अब, वाइफाइ (Wi-Fi) से आती है,
सगी माँ पास बैठी हो, तो भी चैट पर बात हो जाती है।
बर्थडे और एनिवर्सरी, अब नोटिफिकेशन्स का खेल हैं,
दिल से दूर हो गए सब, बस नेटवर्क का मेल है।
हम 'अपडेट' तो रहते हैं, पर भीतर से खाली हैं,
इमोजिस (Emojis) में आंसू हैं, पर आँखों में जाली हैं।
कॉमेंट बॉक्स में न्याय की, बड़ी-बड़ी तलवारें खिंचती हैं,
पर असल दुनिया के जुल्म पर, आँखें अक्सर मिचती हैं।
दुनिया मुट्ठी में है हमारी, पर पड़ोसी का पता नहीं,
सब कुछ तो जान लिया हमने, बस खुद का ही पता नहीं।
हम 'सोशल' तो बहुत हुए, पर 'इंसान' होना भूल गए,
डिजिटल चमक के चक्कर में, असली पहचान भूल गए।
जब बिजली कटती है, तब होश ठिकाने आता है,
कि बिना स्क्रीन के ये संसार, कितना सन्नाटा फैलाता है।
लौट आओ इन पिक्सल्स से, ज़रा मिट्टी को भी छूकर देखो,
ये लाइक और कॉमेंट झूठे हैं, ज़रा अपनों के आंसू पोंछकर देखो।
7 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Deepak Sharma

24 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12492 कविताएं

View Profile