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आई एम ऑनलाइन

Shruti Bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन में पढ़ा था दुनिया है गोल,
        
                                                    
                            
तब विश्वास नहीं था किया,
आज वर्ल्ड वाइड वेब ने,
पूरी तरह से विश्वास दिला दिया|

एक दूजे से मिलना कभी
होता था जो दूभर
आज तो “I am Just a call away”
हो गया है बदलकर!

कहाँ हुआ करती थीं वो बेस्ट फ्रेंड्स की मिसालें
अब तो होड़ लगी है, फेसबुक buddies की लिस्ट बढ़ा डालें|
सामने से की हुई बात तो अब फीकी सी लगती है,
जब तक insta पर लाइक ना आए , तब तक मन में खलबली सी रहती है|

लाइक्स ओर कमेंट्स ने तो तारीफ की
परिभाषा ही बदल डाली है,
ऐसा लगता है No. of Likes , comments and shares
से ही हमारी किस्मत चमकने वाली है! ☺

कहाँ तो मोबाइल पकड़े जाने पर
स्कूल में मिलती थी सज़ा
और अब Byju/Vedantuऑनलाइन क्लासेस
में ही पढ़ने का आने लगा है मज़ा

ऑफिस की बिल्डिंग ये शीशे की
जो बना दी है करोड़ों रुपए लगाकर
आज लगता है, इसे टूरिस्ट स्पॉट
बना देना ही होगा बेहतर!

वर्क फ़्रोम होम और वर्क एट होम
आज हो गया है आम,
समझ नहीं आता कौनसा पहले करें,
घर का या ऑफिस का काम!

अब तो दुनिया घूमने के लिए भी, Virtual Tour app का सहारा है,
Jio Airtel wifi के बिना, तो आज जीना ही नहीं गवारा है|
लव लेटर भी आज कल ई मेल से चली जाती है,
इंतज़ार में था जो खास एहसास, वो धुंधला सा कर जाती है!
एक रिश्ते से दूसरा रिश्ता आज जुड़ रहा है आनलाइन,
ज़ूम और मीट पर ही होगा अब तो मेरीज सर्टिफिकेट पर साइन!
गूगल 3डी एप से घोड़ी चढ़ेगा दूल्हा
पे टीएम से भेज देंगे सालियों को छल्ला!

पार्टी शार्टी होती है वाटसेप काल पर ही
फोटो शेयर करेंगे, फिल्टर लगाकर सभी!
हरी बत्ती, जो बस सड़क पर, जाने की दिशा थी बताती,
आजकल सड़क पर कम, फेसबुक पर ज्यादा है नज़र आती!

फिर ऑफिस की कॉल हो या हो कोई मीटिंग,
नेट अगर चला जाए मिनट भी लगता है अपसेटिंग!
जाने कैसे चल रहा था बिन इंटरनेट संसार,
यही सवाल उठता है आज मन में बार बार!

स्माइलीज़ और स्टिकर ही करते हैं हाल-ए-दिल की बात,
बिना सेंट लगाए ही हो जाती है मुलाक़ात!
फंक्शन, घूमने, खरीदने पर अब खूब हैं पैसे बचाते,
सारे बचे पैसों को अब डाटा पर हैं उड़ाते!

OTT से परेशान हुए बड़े बड़े मल्टीप्लेक्स
उनकी कमाए निचोड़ रहें हैं प्राइम ओर नेट्फ़्लिक्स
कारयाने की दुकान तो अपनी भी अपनी नहीं लगती,
एमेज़ोन है “ अपनी दुकान” जिस पर हर चीज़ है मिलती!

कहाँ सोचा होगा अंबानी, भारती, ने कि बन जाएँगे सिकंदर,
पूरी दुनिया को इन्टरेनेट से कर लेंगे मुट्ठी के अंदर!
आज ही एहसास हुआ है कि असलीयत से कितने हैं हम दूर
वर्चुअल हो गई है ज़िंदगी, बनावट है भरपूर!

समय रहते समझ जाएँ कि रिएल्टी है कुछ और,
वर्चुअल तो क्षण भर क लिए है, करें इस बात पर गौर!
साथ होना अपनों के, वो पुराने दोस्तों से मिलना,
स्काइप रीयूनियन नहीं कर सकती, गले मिलने की तुलना!

जी हाँ, दोस्तों, बिलकुल सही है, ये दुनिया है गोल,
असलीयत से दूर होकर ही, समझ आ रहा है इसका मोल!
अच्छा होगा कर लें हम असली और वर्चुअल दुनिया को कम्बाइन,
नहीं तो बस यही Tag लग जाएगा ज़िंदगी में: “I am Online” 

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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